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स्कूल रजिस्टर में लिखी जन्मतिथि को नहीं माना पुख्ता सबूत, हाई कोर्ट ने कहा- सिर्फ रिकॉर्ड से नाबालिग साबित नहीं होगी लड़की

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा कि केवल स्कूल रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर लड़की की नाबालिग उम्र साबित नहीं होती। उम्र के ठोस प्रमाण के अभाव में आरोपी को बरी कर दिया गया।

October 7, 2026 5:49 AM
कोर्ट ने उपभोक्ता प्रकरण में सुनाया फैसला
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बिलासपुर: किसी लड़की की उम्र साबित करने के लिए सिर्फ स्कूल के दाखिल-खारिज रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि को पर्याप्त नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने एक फैसले की सुनवाई के दौरान इसे रेखांकित किया है। स्कूल के दाखिल-खारिज रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि को  उम्र साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं मानते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि  ये साक्ष्य तब तक नहीं बन सकता, जब खासकर उस तारीख के समर्थन में कोई स्वतंत्र और कानूनी दस्तावेज मौजूद न हो।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में उम्र के प्रमाण से जुड़े इसीपुरुलिया-जमशेदपुर NH-18 पर सोमवार रात हुए सड़क हादसे में तीन बाइक सवार युवकों की मौत हो गई। दुर्घटना झारखंड-बंगाल सीमा से सटे बलरामपुर थाना क्षेत्र के दांतिया आउटपोस्ट के पास हुई। पुलिस के अनुसार, तीनों युवक एक ही बाइक पर सवार होकर बलरामपुर से जमशेदपुर की ओर जा रहे थे।

इसी दौरान सामने से आ रही एक छोटी चार पहिया गाड़ी से उनकी बाइक की जोरदार टक्कर हो गई। टक्कर इतनी तेज थी कि बाइक सवार तीनों युवक सड़क पर गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना की सूचना मिलने के बाद बलरामपुर थाना पुलिस मौके पर पहुंची और स्थानीय लोगों की मदद से घायलों को बांसगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया। सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने जांजगीर-चांपा के राजेंद्र श्रीवास उर्फ मोटू को अपहरण के मामले में बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष लड़की की उम्र का ठोस कानूनी प्रमाण पेश करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने यह भी पाया कि स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि लड़की के पिता द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर दर्ज की गई थी।

स्कूल रजिस्टर में तारीख थी, लेकिन आधार क्या था?

मामला मुलमुला थाना क्षेत्र का है। 30 मई 2019 को एक लड़की घर से चली गई थी। उसके बहनोई ने थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने गुमशुदगी का मामला दर्ज किया।जांच के दौरान पुलिस ने लड़की को उसी दिन जयरामनगर रेलवे स्टेशन पर राजेंद्र श्रीवास के साथ बरामद किया था।मामले में अभियोजन ने लड़की को नाबालिग साबित करने के लिए मुख्य रूप से उसके स्कूल रिकॉर्ड का सहारा लिया।लेकिन हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान इसी रिकॉर्ड की बुनियाद पर सवाल खड़ा हो गया।

प्रधानाध्यापक की गवाही ने खोल दिया रिकॉर्ड का आधार

कोर्ट के सामने स्कूल के प्रधानाध्यापक की गवाही हुई। इसमें उन्होंने बताया कि स्कूल के रजिस्टर में लड़की की जन्मतिथि उसके पिता द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर दर्ज की गई थी।यानी रजिस्टर में तारीख दर्ज जरूर थी, लेकिन उस तारीख को प्रमाणित करने के लिए कोई स्वतंत्र दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं था।न जन्म प्रमाण पत्र पेश किया गया और न ही कोई अन्य सरकारी दस्तावेज।हाई कोर्ट ने इसी कमी को महत्वपूर्ण माना।

जन्म प्रमाण पत्र नहीं, मेडिकल उम्र जांच भी नहीं

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि लड़की की उम्र को लेकर अस्थि परीक्षण यानी ओसिफिकेशन टेस्ट भी नहीं कराया गया था।ऐसे में सवाल यह था कि केवल स्कूल रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर लड़की को कानूनी रूप से नाबालिग कैसे माना जाए?हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियोजन उम्र साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी हवाला

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अलमेलु बनाम राज्य और ऋषिपाल सिंह सोलंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों का उल्लेख किया।इन न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार उम्र निर्धारण के मामले में केवल स्कूल रिकॉर्ड पर आंख बंद करके भरोसा नहीं किया जा सकता। रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि का आधार और उसे साबित करने वाले साक्ष्य भी महत्वपूर्ण होते हैं।यानी स्कूल की कॉपी में तारीख लिखी होना और उस तारीख का कानूनी रूप से साबित होना—दोनों एक ही बात नहीं हैं।

लड़की ने भी कहा- अपनी मर्जी से गई थी

मामले में लड़की के बयान को भी हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण माना। उसने बताया था कि राजेंद्र उसका स्कूल का दोस्त था और दोनों मोबाइल फोन पर बातचीत करते थे।उसके अनुसार 30 मई 2019 को सुबह करीब चार बजे राजेंद्र के बुलाने पर वह अपनी इच्छा से उसके साथ बाइक पर बैठकर चली गई थी।कोर्ट ने यह भी देखा कि लड़की ने जबरदस्ती या विरोध किए जाने की बात नहीं कही थी।

कोर्ट ने कहा- खुद जाना और जबरदस्ती ले जाना अलग बातें

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एस. वरदराजन बनाम स्टेट ऑफ मद्रास के फैसले का भी उल्लेख किया।अदालत ने माना कि किसी लड़की का अपनी इच्छा से किसी व्यक्ति के साथ जाना और उसे जबरदस्ती ले जाना अलग-अलग परिस्थितियां हैं। इस मामले में अभियोजन अपहरण या बहला-फुसलाकर ले जाने के आवश्यक तत्वों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सका।

निचली अदालत की सजा रद्द, आरोपी बरी

विशेष न्यायालय ने 15 अक्टूबर 2019 को राजेंद्र श्रीवास को दोषी मानते हुए आईपीसी की धारा 363 में चार साल और धारा 366 में पांच साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।इस फैसले के खिलाफ राजेंद्र ने हाई कोर्ट में अपील की।

हाई कोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों की समीक्षा के बाद माना कि लड़की की उम्र को लेकर ठोस प्रमाण नहीं है और अपहरण के आरोप भी संदेह से परे साबित नहीं हुए हैं।इसके बाद कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला निरस्त करते हुए राजेंद्र श्रीवास को धारा 363 और 366 के आरोपों से बरी कर दिया।

इस फैसले में स्कूल रिकॉर्ड क्यों बना सबसे बड़ा मुद्दा?

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यही है कि स्कूल रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि को अपने आप अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना गया।जब उस तारीख का आधार अभिभावक द्वारा दी गई जानकारी हो और उसके समर्थन में जन्म प्रमाण पत्र या अन्य विश्वसनीय दस्तावेज मौजूद न हों, तो अदालत उम्र को लेकर उपलब्ध पूरे साक्ष्य की जांच कर सकती है।यानी स्कूल रजिस्टर में तारीख लिखी होना एक बात है, लेकिन अदालत में उस तारीख को कानूनी तौर पर साबित करना दूसरी बात। यही अंतर इस मामले में आरोपी के पक्ष में गया।

 

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