बिलासपुर। मेडिकल लैब टेक्नोलॉजिस्ट भर्ती से जुड़े एक मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्थिति साफ कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि भर्ती विज्ञापन में जिन शर्तों का उल्लेख नहीं है, उन्हें बाद में जोड़कर किसी अभ्यर्थी को चयन प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कोविड 19 महामारी के दौरान दी गई सेवाओं के लिए मिले 10 बोनस अंक काटने की कार्रवाई को मनमाना और अवैश बताते हुए स्वास्थ्य विभाग को अभ्यर्थी की पात्रता पुन निर्धारित करने का निर्देश दिया है।
दरअसल रायपुर निवासी मोहम्मद हाशिम की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने स्वास्थ्य विभाग को आदेश दिया कि कोविड सेवा के लिए दिए गए 10 बोनस अंक बहाल किए जाएं और यदि संशोधित मेरिट के आधार पर वह चयनित श्रेणी में आते हैं तो 40 दिनों के भीतर नियुक्ति एवं पदस्थापना आदेश जारी किया जाए। याचिकाकर्ता मोहम्मद हाशिम ने भर्ती प्रक्रिया के दौरान राजनांदगांव के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) द्वारा जारी अनुभव प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया था।
इस प्रमाण पत्र में कोविड काल के दौरान छह माह से अधिक सेवा देने की पुष्टि की गई थी। इसी आधार पर उन्हें 10 बोनस अंक मिले थे, जिससे कुल अंक बढ़कर 80.84 हो गए और वे प्रारंभिक मेरिट सूची में प्रथम स्थान पर पहुंच गए थे। लेकिन, स्वास्थ्य विभाग ने यह कहते हुए उनके 10 अंक घटा दिए कि उन्होंने मूल नियुक्ति आदेश प्रस्तुत नहीं किया है। अंक कटने के बाद उनकी रैंकिंग गिरकर नौवें स्थान पर पहुंच गई और चयन की संभावना प्रभावित हो गई।
क्यों काटे गए थे अंक
स्वास्थ्य विभाग ने यह कहते हुए 10 अंक घटा दिए कि अभ्यर्थी ने मूल नियुक्ति आदेश प्रस्तुत नहीं किया। इसके बाद उनकी रैंकिंग गिरकर 9वें स्थान पर पहुंच गई, जिससे चयन प्रभावित हुआ।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने कहा कि:
- भर्ती विज्ञापन में मूल नियुक्ति आदेश अनिवार्य होने का कोई उल्लेख नहीं था।
- चयन प्रक्रिया के बीच नई शर्त जोड़ना निष्पक्षता के खिलाफ है।
- भर्ती एजेंसियां मनमाने तरीके से नियम नहीं बदल सकतीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि भर्ती विज्ञापन में कहीं भी यह उल्लेख नहीं था कि कोविड सेवा के प्रमाण के लिए मूल नियुक्ति आदेश प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। ऐसे में चयन प्रक्रिया के बीच नई शर्त लागू करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। उच्च अदालत ने टिप्पणी की कि भर्ती एजेंसियां विज्ञापन जारी होने के बाद मनमाने ढंग से अतिरिक्त पात्रता या दस्तावेज संबंधी शर्ते नहीं जोड़ सकतीं। ऐसा करना समान अवसर और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया के सिद्धांतों के विपरीत है।
अदालत ने याचिकाकर्ता के अधिकारों को प्रभावित करने वाली अंतिम चयन सूची और उससे संबंधित नियुक्तियों को उस सीमा तक निरस्त कर दिया, जहां वे उनके हितों के प्रतिकूल थीं। इसके साथ ही विभाग को निर्देश दिया गया कि मोहम्मद हाशिम की मेरिट का पुनर्मूल्यांकन 10 बोनस अंक जोड़कर किया जाए। यदि संशोधित मेरिट में वे चयनित अभ्यर्थियों की श्रेणी में आते हैं तो उन्हें 40 दिनों के भीतर नियुक्ति और पदस्थापना दी जाए।
कोर्ट का आदेश
- 10 बोनस अंक फिर से जोड़े जाएं
- संशोधित मेरिट के आधार पर पुनर्मूल्यांकन किया जाए
- यदि अभ्यर्थी चयनित श्रेणी में आता है, तो 40 दिनों के भीतर नियुक्ति और पदस्थापना दी जाए
क्यों अहम है फैसला
यह निर्णय न सिर्फ इस मामले के लिए बल्कि भविष्य की सभी सरकारी भर्तियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है। इससे साफ हो गया है कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और तय नियमों का पालन अनिवार्य है।










