बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि भारतीय सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए ऐसे मामलों में पत्नी की सुविधा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जिसके बाद हाईकोर्ट ने दुर्ग फैमिली कोर्ट में लंबित तलाक के मामले को बेमेतरा स्थानांतरित करने का आदेश दिया है।
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक मामलों में मुकदमे की सुनवाई के स्थान का निर्धारण करते समय पत्नी की परिस्थितियों, आर्थिक स्थिति और यात्रा संबंधी कठिनाइयों को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए।
शादी के कुछ महीनों बाद बढ़ा विवाद
दरअसल ये मामला बेमेतरा जिले के ग्राम शारदा निवासी फातिमा निशा का है। उनका निकाह 27 सितंबर 2024 को दुर्ग निवासी शेख साहिल से हुआ था। याचिका के अनुसार विवाह के कुछ समय बाद पति द्वारा प्रताड़ित किए जाने के कारण महिला अपने छोटे बच्चे के साथ मायके में रहने लगी।इसी दौरान पति ने दुर्ग स्थित फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर कर दी। दूसरी ओर पत्नी ने हाईकोर्ट में आवेदन देकर मामले को बेमेतरा स्थानांतरित करने की मांग की।
एक साल के बच्चे के साथ दुर्ग जाना मुश्किल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि महिला वर्तमान में अपने मायके में रह रही है और उसके साथ एक छोटा बच्चा भी है। ऐसे में हर सुनवाई के लिए बेमेतरा से दुर्ग जाना उसके लिए आर्थिक और शारीरिक रूप से कठिन है।सुनवाई के दौरान पति की ओर से कोई पक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके बाद हाईकोर्ट ने मामले की एकपक्षीय सुनवाई की।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि वैवाहिक विवादों में मुकदमे के स्थानांतरण पर विचार करते समय पत्नी की सुविधा और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।कोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज में अधिकांश मामलों में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां पुरुषों की तुलना में अलग होती हैं, इसलिए न्याय तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करना अदालतों की जिम्मेदारी है।
चार महीने में ट्रायल पूरा करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने दुर्ग फैमिली कोर्ट में लंबित तलाक मामले को बेमेतरा स्थानांतरित करने का आदेश देते हुए संबंधित अदालत को निर्देश दिया है कि मामले की सुनवाई तेजी से पूरी की जाए और चार महीने के भीतर ट्रायल समाप्त करने का प्रयास किया जाए।










