कांकेर। क्या सरकारी रिकॉर्ड में किसी मृत व्यक्ति को जिंदा दिखाकर उसके नाम पर सरकारी राशि निकाली जा सकती है? क्या किसी की मौत के बाद भी सरकारी फाइलों में उससे मजदूरी कराई जा सकती है? कांकेर वन विभाग से सामने आया एक मामला सरकारी तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। मामला केवल 6,066 रुपये के भुगतान का नहीं है, बल्कि यह इस बात की जांच की मांग करता है कि कहीं सरकारी योजनाओं के नाम पर फर्जी भुगतान का कोई बड़ा खेल तो नहीं चल रहा।
RTI में सामने आया भुगतान का रिकॉर्ड
सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, कांकेर वन मंडल के चारामा वन परिक्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंडरीपानी में राज्य कैम्पा (CAMPA) योजना के तहत मजदूरी भुगतान रजिस्टर में स्वर्गीय मिलन जुर्री और उनके छोटे भाई परमेश्वर के नाम 3,033-3,033 रुपये का भुगतान दर्ज है। यहीं से पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया।
परिजनों का दावा- मौत के बाद कैसे मिली मजदूरी?
ग्रामीणों और मृतक के परिजनों का दावा है कि मिलन जुर्री की 23 सितंबर 2023 को बीमारी के दौरान मृत्यु हो चुकी थी। उनका कहना है कि न तो मिलन जुर्री ने कैम्पा योजना के किसी कार्य में मजदूरी की और न ही परिवार को इस भुगतान की कोई जानकारी है।परिवार का आरोप है कि उन्हें कभी कोई राशि प्राप्त नहीं हुई। यदि यह दावा सही है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि मृत व्यक्ति के नाम पर भुगतान किसने प्राप्त किया?
RTI कार्यकर्ता ने उठाया था मामला
बताया जाता है कि कोंडागांव के एक आरटीआई कार्यकर्ता ने वन विभाग से भुगतान संबंधी दस्तावेज प्राप्त करने के बाद इस मामले की शिकायत भी की थी।हालांकि, शिकायत के बाद जांच कहां तक पहुंची, क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी तय हुई और क्या कोई कार्रवाई हुई—इस संबंध में अब तक कोई सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है।
तीन प्रमुख किरदार अब नहीं रहे जीवित
इस मामले का एक बेहद चौंकाने वाला पहलू यह भी है कि—
• जिस व्यक्ति के नाम भुगतान दर्ज है, उसकी मृत्यु हो चुकी है।
• जिस आरटीआई कार्यकर्ता ने मामला उठाया, उनका भी निधन हो चुका है।
• उस समय के वन परिक्षेत्र अधिकारी भी अब जीवित नहीं हैं।
लेकिन विभागीय रिकॉर्ड आज भी भुगतान दर्ज होने की कहानी बयां कर रहे हैं।
जमीनी हकीकत और सरकारी रिकॉर्ड में विरोधाभास
जब संवाददाता ने पंडरीपानी गांव पहुंचकर मृतक के परिजनों से बात की तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि मिलन जुर्री ने कभी वन विभाग के किसी कैम्पा कार्य में मजदूरी नहीं की और न ही परिवार को किसी भुगतान की जानकारी है।ऐसे में सरकारी रिकॉर्ड और ग्रामीणों के दावों के बीच स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है।
वन विभाग का जवाब भी उठाता है सवाल
जब इस पूरे मामले पर वर्तमान वनमंडल अधिकारी से सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यदि मीडिया लिखित शिकायत देगी तो मामले की जांच कराई जाएगी।इस जवाब के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि जब विभाग के पास स्वयं भुगतान के रिकॉर्ड मौजूद हैं, तो क्या प्रथम दृष्टया जांच शुरू करने के लिए भी अलग से शिकायत का इंतजार किया जाना चाहिए?
क्या यह सिर्फ एक मामला है या बड़े फर्जीवाड़े की आहट?
यह मामला केवल 6,066 रुपये के भुगतान तक सीमित नहीं है। इससे कई बड़े सवाल खड़े होते हैं—
• क्या मृत व्यक्तियों के नाम पर और भी भुगतान हुए हैं?
• क्या यह रिकॉर्ड की तकनीकी त्रुटि है या सुनियोजित वित्तीय अनियमितता?
• क्या सरकारी योजनाओं में लाभार्थियों के सत्यापन की व्यवस्था प्रभावी है?
• क्या आदिवासियों के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया?
इन सवालों के जवाब निष्पक्ष विभागीय जांच के बाद ही सामने आ सकेंगे।
जांच की मांग तेज
स्थानीय स्तर पर इस पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय होना आवश्यक होगा। साथ ही यह भी जांच का विषय होगा कि कहीं इस तरह के भुगतान अन्य योजनाओं या क्षेत्रों में भी तो नहीं किए गए।
अस्वीकारण: ये खबर शासकीय कार्य में हुए व्यापक भ्रष्टाचार का खुलासा है। खबरों में मुर्दा, भूत जैसे शब्दों का इस्तेमाल भ्रष्टाचार पर कटाक्ष करने के लिए किया गया है।










