बिलासपुर। दहेज प्रताड़ना के मामले में हाईकोर्ट ने एक बड़ा ही अहम फैसला सुनाया है। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने दहेज प्रताड़ना और हत्या से जुड़े एक अहम मामले में निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए पति, सास और ससुर को बरी रखने के आदेश को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से दहेज प्रताड़ना का आरोप साबित नहीं होता। रिकॉर्ड से यह सामने आया कि नवविवाहिता अपने पति के दिव्यांग होने के कारण मानसिक रूप से परेशान थी, न कि दहेज की मांग के कारण।
जांजगीर-चांपा के झलमला गांव का मामला
मामला जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम झलमला का है। जानकारी के मुताबिक अजय निर्मलकर और निमी निर्मलकर का विवाह 1 मई 2016 को हुआ था। शादी के महज तीन महीने बाद, 14 अगस्त 2016 को निमी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। घटना के बाद मृतका के ससुर ने थाने में मर्ग कायम कराया।करीब 10 दिन बाद, 24 अगस्त 2016 को मृतका के भाई ने शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि उसकी बहन को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था, जिसके कारण उसकी मौत हुई।
निचली अदालत ने किया था बरी
मामले की सुनवाई के बाद अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने वर्ष 2018 में पति, सास और ससुर को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया था। इस फैसले को राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में चुनौती दी।
गवाहों के बयानों की गहन समीक्षा
जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने सभी गवाहों के बयान और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि दहेज मांगने और प्रताड़ित करने के आरोप विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित नहीं हो सके।खंडपीठ ने यह भी माना कि दहेज प्रताड़ना की कहानी बाद में सामने आई और अभियोजन पक्ष इसे ठोस प्रमाणों से सिद्ध नहीं कर पाया।
पति की दिव्यांगता से थी मानसिक परेशानी
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि मृतका अपने पति की शारीरिक दिव्यांगता के कारण मानसिक रूप से परेशान थी। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था।
राज्य सरकार की अपील खारिज
सभी तथ्यों और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और अतिरिक्त सत्र न्यायालय द्वारा आरोपितों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा।










