बिलासपुर। रेप के मामले में हाईकोर्ट ने बड़ा ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि एफएसएल रिपोर्ट में कपड़ों या वैजाइनल स्लाइड पर वीर्य मिलने भर से किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जब तक कि डीएनए प्रोफाइलिंग या सेरोलाजिकल जांच से यह साबित न हो जाए कि वह वीर्य आरोपी का ही है, तब तक ऐसे वैज्ञानिक साक्ष्य दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जशपुर जिले के चर्चित अपहरण एवं पाक्सो मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य शासन की अपील खारिज कर दी है।
जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की डिवीजन बेंच ने विशेष पाक्सो अदालत द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल एफएसएल (फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी) रिपोर्ट में मानव वीर्य मिलने से किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
DNA या सेरोलॉजिकल जांच के बिना अधूरी है वैज्ञानिक कड़ी
हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद अपने फैसले में कहा कि यदि कपड़ों या वैजाइनल स्लाइड पर मानव वीर्य मिलने की पुष्टि होती है, तो भी यह अपने-आप में दोषसिद्धि का आधार नहीं बनता। जब तक डीएनए प्रोफाइलिंग या सेरोलॉजिकल जांच के जरिए यह साबित नहीं हो जाता कि वह वीर्य आरोपी का ही है, तब तक अभियोजन की वैज्ञानिक कड़ी अधूरी मानी जाएगी।खंडपीठ ने कहा कि सिर्फ संदेह, अनुमान या अधूरी वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
पीड़िता ने अदालत में आरोपों का नहीं किया समर्थन
कोर्ट में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने अदालत में अपहरण और दुष्कर्म के आरोपों का समर्थन नहीं किया। उसने अपने बयान में कहा कि वह अपनी सहेली के साथ स्वेच्छा से दूसरे गांव गई थी और आरोपियों ने उसके साथ कोई गलत काम नहीं किया।इसके अलावा, कथित बरामदगी के दोनों पंच गवाह भी अपने पहले के बयान से मुकर गए, जिससे अभियोजन का मामला और कमजोर हो गया।
अधूरी FSL रिपोर्ट पर नहीं हो सकती दोषसिद्धि
राज्य सरकार की ओर से एफएसएल रिपोर्ट का हवाला देते हुए दुष्कर्म की पुष्टि का दावा किया गया। हालांकि, बचाव पक्ष ने दलील दी कि वीर्य की मात्रा कम होने के कारण न तो सेरोलॉजिकल परीक्षण हो सका और न ही डीएनए प्रोफाइलिंग, इसलिए आरोपी और वैज्ञानिक साक्ष्य के बीच कोई संबंध स्थापित नहीं हो सका। हाईकोर्ट ने कहा कि वैज्ञानिक परीक्षण के दौरान तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि दुष्कर्म जैसे मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए डीएनए या सेरोलॉजिकल मिलान अत्यंत आवश्यक है। यदि यह कड़ी स्थापित नहीं होती और पीड़िता भी आरोपों का समर्थन नहीं करती, तो केवल अधूरी एफएसएल रिपोर्ट के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
क्या था मामला?
मामला जशपुर जिले के ग्राम जुड़वैन का है। अभियोजन के अनुसार वर्ष 2017 में दो युवकों पर एक नाबालिग लड़की के अपहरण और दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था। मामले की सुनवाई के बाद 30 अक्टूबर 2017 को विशेष पाक्सो अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर दोनों आरोपियों को बरी कर दिया था। इस फैसले को राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य की अपील खारिज कर दी।










