बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी मामले का सिविल स्वरूप होना आपराधिक कार्रवाई को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता। यदि रिकॉर्ड में प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं, तो आरोपित को ट्रायल का सामना करना ही होगा।मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने बिलासपुर के चर्चित सात लाख रुपये के प्लॉट धोखाधड़ी मामले में आरोपित दयानंद पासवान की याचिका खारिज कर दी।
प्लॉट बेचने के नाम पर सात लाख लेने का आरोप
मामला वर्ष 2019 का है, जो कोहका-जली स्थित “पासवान वीकेंड हाउस” परियोजना में 6000 वर्गफीट प्लॉट के सौदे से जुड़ा है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, आरोपित ने प्लॉट बेचने के नाम पर सात लाख रुपये अग्रिम लिए, लेकिन न तो बिक्री विलेख (रजिस्ट्री) कराई और न ही रकम वापस लौटाई।पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि जिस भूमि का सौदा किया गया, उस पर आरोपित का वैध स्वामित्व ही नहीं था। इसके बाद तारबाहर थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच पूरी करते हुए चार्जशीट न्यायालय में पेश कर दी।
एफआईआर रद्द करने की मांग ठुकराई
आरोपित ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर एफआईआर और चार्जशीट को निरस्त करने की मांग की। उसका तर्क था कि यह पूरी तरह सिविल विवाद है और इसे आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।हालांकि राज्य शासन ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि मामले में प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी के पर्याप्त तथ्य मौजूद हैं, इसलिए आपराधिक कार्रवाई जारी रहनी चाहिए।
हाई कोर्ट ने क्या कहा
डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि BNSS की धारा 528 के तहत एफआईआर रद्द करने की शक्ति सीमित परिस्थितियों में ही प्रयोग की जा सकती है। केवल इस आधार पर कि विवाद का सिविल पक्ष भी मौजूद है, आपराधिक कार्रवाई को समाप्त नहीं किया जा सकता।अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी का मामला बनता है, तो आरोपित को विधि अनुसार ट्रायल का सामना करना होगा। इसी आधार पर कोर्ट ने दयानंद पासवान की याचिका खारिज कर दी।










