रायपुर। आखिरकार बलरामपुर-रामानुजगंज के जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) को हटा दिया गया है। गंभीर आरोपों से घिरे प्रभारी डीईओ की छुट्टी हो गई है। छत्तीसगढ़ शासन स्कूल शिक्षा विभाग मंत्रालय, महानदी भवन, नवा रायपुर अटल नगर द्वारा जारी आदेश (दिनांक 28/09/2026) के अनुसार मनीराम यादव (प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी, बलरामपुर-रामानुजगंज) को वहाँ से हटाकर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय परसा, विकासखंड अंबिकापुर, जिला सरगुजा में पदस्थ किया गया है। वहीं, शासकीय हाई स्कूल कोराचा (विकासखंड मानपुर, जिला मोहला-मानपुर-अं. चौकी) के प्राचार्य नरेन्द्र कुमार निरापुरे को नया प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी, बलरामपुर-रामानुजगंज बनाया गया है।

4.51 करोड़ रुपए के घोटाले का मामला
आपको बता दें कि शिक्षा विभाग में 2.42 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी करने और अलग-अलग जिलों में चार बार निलंबित होने वाले बलरामपुर जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) मनीराम यादव एक बार फिर नए घोटाले को लेकर चर्चा में आए थे। इस बार उन्होंने फर्नीचर, स्वच्छता सामग्री, खेल व व्यायाम के साथ स्टेशनरी की खरीदी में 4.51 करोड़ रुपए के घोटाले को अंजाम दिया था।
कलेक्टर की जांच में भ्रष्टाचार का खुलासा भी हो गया है, इसके बावजूद अभी तक डीईओ यादव के खिलाफ केस दर्ज नहीं कराया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2025-26 में बलरामपुर शिक्षा विभाग को छह योजनाओं के लिए कुल 4.57 करोड़ रुपए का बजट मिला था। इसमें स्कूल की छात्राओं के लिए साइकिल के साथ विज्ञान व प्रौद्योगिकी सामग्री, फर्नीचर के साथ दूसरे जरूरी सामान खरीदने थे। डीईओ यादव ने सरकारी राशि हड़पने के लिए जेम (GEM) पोर्टल के नियमों को ताक पर रख कर बिना क्रय समिति बनाए और भौतिक सत्यापन किए करोड़ों रुपए के फर्जी बिल पास कर दिए।
भंडार क्रय नियमों की अनदेखी और गबन
बलरामपुर के इस मामले में गबन करने के लिए जिला स्तरीय क्रय समिति तक नहीं बनाई गई थी। 4.51 करोड़ रुपए की खरीदी से पहले डीईओ यादव ने न तो जिला स्तरीय क्रय समिति का गठन किया और न ही स्टॉक रजिस्टर मेंटेन किया। छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम, 2002 के नवीनतम नियम के नियम 4.12 में स्पष्ट है कि जिस कार्यालय में प्रतिवर्ष 50 हजार रुपए या उससे अधिक की खरीदी होती है, वहाँ क्रय समिति बनाई जाए, जिसमें विभाग में पदस्थ लेखा अधिकारी/लेखा प्रभारी को अनिवार्य रूप से सदस्य बनाया जाना है।
जाँच में सामने आए मुख्य बिंदु:
• सामग्री का ब्यौरा गायब: खरीदी किया गया सामान आया या नहीं, आया तो कितना आया, किन स्कूलों को कितना सामान मिला, किसी को कुछ पता नहीं था। भंडार गृह में स्टॉक रजिस्ट्री पर एंट्री तक नहीं कराई गई थी।
• कैशबुक में कटिंग और ओवरराइटिंग: जाँच के दौरान कार्यालय के लिपिकों ने कई सामग्रियों की प्राप्ति और खरीदी की जानकारी से इनकार किया। कैशबुक में भारी कटिंग, ओवरराइटिंग और अप्रमाणित सुधार मिले हैं।
• साइकिल और विज्ञान किट में अनियमितता: इसमें 4025 साइकिलों का 1.62 करोड़ रुपए का भुगतान शामिल है, जिसकी न तो स्टॉक एंट्री मिली और न ही चालान मिला। इसके अलावा 42 लाख रुपए की विज्ञान किट खरीदी गई, जिसका न तो सत्यापन हुआ और न ही स्टॉक दर्ज कराया गया।
• टेंडर से बचने के तरीके और अन्य फर्जी खर्चे: टेंडर से बचने के लिए 50-50 हजार के बिल और एक ही फर्म को भुगतान किए गए। स्टेशनरी के नाम पर 11.20 लाख रुपए बिना कोटेशन और स्टॉक एंट्री के निकाल लिए गए। परीक्षा की मुद्रण सामग्री के लिए राँची की एक फर्म को 17.96 लाख रुपए दिए गए।
• नाश्ते पर उड़ाए गए रुपए: शिक्षा विभाग की बैठकों में अफसरों के नाश्ते पर ही करीब 4 लाख रुपए खर्च कर दिए गए।
शिकायत मिलने पर कलेक्टर ने अपर कलेक्टर प्रमोद गुप्ता और जिला कोषालय अधिकारी दशरथ सोनी से इसकी जाँच कराई थी, जिसमें कई भुगतान ऐसे मिले जिनसे संबंधित सामग्री कार्यालय या भंडार में थी ही नहीं और कई बिलों को टुकड़ों में बांटकर भुगतान कर दिया गया था।










