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करवा चौथ का व्रत तोड़ना तलाक का आधार नहीं, बिलासपुर हाईकोर्ट ने पति के पक्ष की डिक्री की निरस्त

बिलासपुर हाईकोर्ट ने कहा कि करवा चौथ का व्रत तोड़ना और सामान्य वैवाहिक विवाद अपने आप में क्रूरता नहीं हैं। कोर्ट ने पति के पक्ष की तलाक डिक्री निरस्त कर दी।

September 29, 2026 5:07 AM
शादी की फ़ाइल फोटो
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Highcourt News। करवा चौथ का व्रत तोड़ना तलाक मांगने का आधार नहीं बनता। हाईकोर्ट ने पति की याचिका को ये कहते हुए खारिज कर दिया कि, ये मानसिक क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता। कोर्ट ने कहा कि करवा चौध बीच में तोड़ना या वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य विवाद अपने आप में तलाक का आधार नहीं बन सकते।

बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट की ओर से पति के पक्ष में दी गई तलाक की डिक्री को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सामान्य वैवाहिक मतभेद और छोटे-मोटे झगड़ों को हर मामले में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।

पति ने करवा चौथ का व्रत तोड़ने का लगाया था आरोप

दरअसल ये पूरा मामला महासमुंद निवासी दंपती से जुड़ा है, जिनका विवाह 10 दिसंबर 2011 को गुरुद्वारा में हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार हुआ था। पति की ओर से आरोप लगाया गया था कि विवाह के कुछ समय बाद पत्नी छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद करने लगी थी।पति ने यह भी आरोप लगाया था कि पत्नी सास-ससुर का सम्मान नहीं करती थी और कई बार बिना पर्याप्त कारण बताए मायके चली जाती थी।

इसके अलावा उसने पत्नी पर धार्मिक परंपराओं का पालन नहीं करने का आरोप लगाया।पति के मुताबिक, पत्नी करवा चौथ का व्रत भी बीच में तोड़ देती थी और कहती थी कि जब उसे साथ नहीं रहना है तो व्रत रखने का क्या फायदा। पति ने इन परिस्थितियों को वैवाहिक संबंधों में मानसिक क्रूरता का आधार बताया था।

पत्नी पर झूठे केस का भी लगाया था आरोप

पति की ओर से पत्नी पर झूठा मामला दर्ज कराने और घरेलू हिंसा की शिकायत करने का आरोप भी लगाया गया था। उसका तर्क था कि इस तरह की कार्रवाई मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आती है और वैवाहिक संबंधों को प्रभावित करती है।इन्हीं आरोपों के आधार पर फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित की थी। इसके बाद पत्नी ने फैमिली कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पत्नी ने कहा- वैवाहिक जीवन बचाने के लिए तैयार थी

पत्नी ने पति के आरोपों को गलत बताया। उसका कहना था कि वह हमेशा वैवाहिक जीवन को बचाने और पति के साथ रहने के लिए तैयार रही है।पत्नी ने ससुराल पक्ष पर दहेज की मांग और शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए। उसके मुताबिक, 2 जुलाई 2018 को रसोई में पैसों की मांग को लेकर उसके साथ मारपीट की गई।

उसने आरोप लगाया कि पति ने उसके बाल पकड़कर उसे एक कमरे में बंद कर दिया था, जिससे उसका एक दांत भी टूट गया।पत्नी के अनुसार, अपनी सुरक्षा के लिए वह किसी तरह वहां से निकलकर गुरुद्वारा पहुंची और इसके बाद अपने परिजनों तथा पुलिस को घटना की जानकारी दी।

हाईकोर्ट ने कहा- हर वैवाहिक विवाद क्रूरता नहीं

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में सामान्य उतार-चढ़ाव, वैचारिक मतभेद और छोटे-मोटे झगड़े अपने आप में क्रूरता नहीं माने जा सकते। क्रूरता साबित करने के लिए ऐसा गंभीर आचरण सामने आना जरूरी है, जिससे पीड़ित पक्ष के लिए वैवाहिक जीवन जारी रखना असंभव या अत्यंत कठिन हो जाए।कोर्ट ने पति की ओर से लगाए गए आरोपों को सामान्य प्रकृति का माना और कहा कि केवल ऐसे आरोपों के आधार पर क्रूरता साबित नहीं होती।

पुलिस में शिकायत करना भी अपने आप में क्रूरता नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपने अधिकारों या समस्याओं के समाधान के लिए किसी जीवनसाथी द्वारा पुलिस में शिकायत करना या कानूनी कार्रवाई करना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।कोर्ट के अनुसार, ऐसी शिकायत को क्रूरता मानने के लिए यह साबित होना जरूरी है कि शिकायत दुर्भावनापूर्ण थी और पूरी तरह झूठी थी। केवल शिकायत दर्ज कराने के आधार पर उसे क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

फैमिली कोर्ट का तलाक आदेश बदला

हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और दोनों पक्षों के तर्कों पर विचार करने के बाद फैमिली कोर्ट की ओर से पति के पक्ष में दी गई तलाक की डिक्री को निरस्त कर दिया। पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने माना कि इस मामले में पति की ओर से लगाए गए आरोपों से वैवाहिक क्रूरता और परित्याग के आधार पर्याप्त रूप से साबित नहीं होते।फैसले में हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण बात दोहराई कि हर वैवाहिक मतभेद को क्रूरता नहीं माना जा सकता और सामान्य दांपत्य विवाद तलाक का स्वतः आधार नहीं बनते।

 

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