मुंगेली: भारतीय शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक अमले की कार्यशैली पर एक बार फिर से बड़ा सवालिया निशान लग गया है। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले से शिक्षा विभाग का एक ऐसा ‘अजीबोगरीब’ और हास्यास्पद फरमान सामने आया है, जिसे पढ़कर आप सिर पीट लेंगे या फिर शासन-प्रशासन की सुस्ती पर सिर्फ ठहाका लगा सकते हैं। मामला सुनकर आप भी कहेंगे—वाह रे बाबूशाही! गलती विभाग की, लापरवाही अधिकारियों की, और सजा भुगतेगा बेचारा शिक्षक!
5 साल तक विभाग सोता रहा, अब 13 साल बाद उठी नींद!
आदेश के दस्तावेजों पर गौर फरमाइश कीजिए। मामला 01.05.2013 से 30.06.2018 यानी पूरे 5 साल की उस अवधि का है, जब शिक्षकों के क्रमोन्नत वेतनमान का निर्धारण विभाग के ही बुद्धिजीवियों (या यों कहें कि आंख मूंदकर हस्ताक्षर करने वाले बाबुओं) द्वारा किया गया था। इस अवधि के दौरान शिक्षकों को हर महीने बढ़ा हुआ वेतन मिलता रहा। विभाग के किसी भी अधिकारी, लेखापाल या निरीक्षक को पांच साल तक यह नजर नहीं आया कि गणना में कोई गलती हुई है।
लेकिन कहते हैं ना कि सरकारी तंत्र की सुस्ती इतनी गहरी होती है कि कुंभकर्ण भी शरमा जाए। गलती होने के ठीक 13 साल बाद (साल 2026 में) अचानक शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की नींद खुली है। उन्हें यह ‘ज्ञान प्राप्ति’ हुई है कि अरे! तब तो ज्यादा वेतन भुगतान हो गया था!

अब वसूली के लिए सिर्फ 3 दिन का अल्टीमेटम!
गलती अधिकारियों की, समीक्षा मेंलापरवाही विभाग की—मगर इसका हर्जाना अब मुंगेली विकासखंड के प्रधान पाठकों और सहायक शिक्षकों को भुगतना पड़ रहा है। कार्यालय विकासखंड शिक्षा अधिकारी, मुंगेली द्वारा जारी ताजा आदेश के अनुसार, प्रत्येक शिक्षक/कर्मचारी से ₹3,55,683/- की राशि शासकीय कोष में रिकवरी (वसूली) योग्य पाई गई है।
हद तो तब हो गई जब विभाग ने शिक्षकों को वसूली के लिए महज 03 (तीन) दिनों का अल्टीमेटम थमा दिया है। फरमान में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि 3 दिन के भीतर लिखित सहमति नहीं दी, तो यह मान लिया जाएगा कि आपको कोई आपत्ति नहीं है और अगले महीने से वेतन से सीधे कटौती शुरू कर दी जाएगी। वाह रे न्याय! पहले खुद गलती करो, सालों तक चुप बैठो, और जब मर्जी आए कर्मचारियों की गाढ़ी कमाई पर कैंची चला दो।
क्या अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
यह पूरा मामला प्रशासनिक लापरवाही का एक जीवंत उदाहरण है। सवाल यह उठता है कि:
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जब 2013 से 2018 के बीच वेतन निर्धारण हुआ था, तब (Account) और ऑडिट विंग क्या कर रहा था?
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क्या इन 5 सालों में ऑडिट या वेतन सत्यापन के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई जाती रही?
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अगर विभाग के अधिकारियों की गलती से गलत निर्धारण हुआ, तो उसकी सजा शिक्षकों को क्यों? क्या उन लापरवाह अधिकारियों और बाबुओं पर कोई कार्रवाई होगी जिन्होंने गलत गणना करके फाइल पास की थी?
फिलहाल, मुंगेली के शिक्षा विभाग का यह तुगलकी फरमान शिक्षकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। अब देखना यह है कि क्या शिक्षक संगठन इस मनमाने आदेश के खिलाफ आवाज उठाते हैं या फिर विभाग की इस प्रशासनिक भूल का शिकार बनकर अपनी जेब कटवाने को विवश होते हैं।
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