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पद्म विभूषण तीजन बाई नहीं रहीं: पंडवानी की अमर आवाज थमी, लोक कला के स्वर्णिम युग का हुआ अंत

छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का 70 वर्ष की उम्र में रायपुर एम्स में निधन। जानिए उनके संघर्ष, उपलब्धियां और लोक कला में अमूल्य योगदान।

July 5, 2026 4:35 AM
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रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाने वाली पंडवानी की महान गायिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का शनिवार देर रात निधन हो गया। 70 वर्षीय तीजन बाई ने रात 3:15 बजे रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश के कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके जाने के साथ ही भारतीय लोक कला के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत हो गया। तीजन बाई के स्वास्थ्य को लेकर सरकार भी चिंतित थी। उनके निधन पर मुख्यमंत्री से लेकर तमाम मंत्रियों ने भी शोक जताया है।

पंडवानी को दिलाई वैश्विक पहचान

डॉ. तीजन बाई ने अपनी दमदार आवाज, सशक्त अभिनय और अनूठी प्रस्तुति शैली से पंडवानी गायन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। हाथ में तंबूरा लेकर जब वे मंच पर महाभारत की कथाएं सुनाती थीं, तो दर्शकों को ऐसा महसूस होता था मानो महाभारत के पात्र उनके सामने जीवंत हो उठे हों। उन्होंने भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में अपनी प्रस्तुतियों से छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का परचम लहराया। उन्होंने विदेशों में भी कई कार्यक्रम किये।

पुरुषों की शैली में गाकर रचा इतिहास

तीजन बाई ने उस समय परंपराओं को चुनौती दी, जब महिलाएं केवल बैठकर ‘वेदमती शैली’ में पंडवानी प्रस्तुत करती थीं। उन्होंने पुरुष कलाकारों की तरह खड़े होकर ‘कापालिक शैली’ में पंडवानी गाना शुरू किया और ऐसा करने वाली देश की पहली महिला कलाकार बनीं। उनकी इस पहल ने लोक कला की दुनिया में एक नया इतिहास रच दिया।

समाज ने किया बहिष्कार, लेकिन नहीं टूटा हौसला

24 अप्रैल 1956 को भिलाई के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। पारधी समाज से आने वाली तीजन बाई को पंडवानी गाने के कारण समाज से बहिष्कृत तक कर दिया गया था। बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी और अपने जुनून को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया।

नाना से मिली प्रेरणा, 13 साल की उम्र में पहला मंच

बचपन में वे अपने नाना ब्रजलाल से महाभारत की कथाएं सुनती थीं। यहीं से उनके भीतर पंडवानी के प्रति रुचि पैदा हुई। बाद में गायक उमेद सिंह देशमुख से उन्होंने विधिवत प्रशिक्षण लिया। महज 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली सार्वजनिक प्रस्तुति देकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।

स्कूल नहीं गईं, लेकिन मिलीं चार डी.लिट उपाधियां

तीजन बाई कभी नियमित रूप से स्कूल नहीं जा सकीं। बाद में साक्षरता अभियान के माध्यम से उन्होंने पांचवीं तक की शिक्षा प्राप्त की। लेकिन उनकी कला ने उन्हें ऐसी पहचान दिलाई कि देश-विदेश के विश्वविद्यालयों ने उन्हें चार मानद डी.लिट उपाधियों से सम्मानित किया। उन्हें भारत रत्न को छोड़कर देश के लगभग सभी प्रमुख नागरिक सम्मान प्राप्त हुए।

पद्म विभूषण सहित कई राष्ट्रीय सम्मान

भारतीय लोक कला में अतुलनीय योगदान के लिए डॉ. तीजन बाई को पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह साबित किया कि प्रतिभा किसी बंधन की मोहताज नहीं होती।

लोक कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति

डॉ. तीजन बाई का निधन भारतीय लोक संस्कृति के लिए ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई संभव नहीं है। उनकी आवाज, उनकी प्रस्तुति और पंडवानी को विश्व मंच तक पहुंचाने का उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेंगी।

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