Bilaspur High Court News | Jashpur Kotwar Case
बिलासपुर। साल 2021 में आयी फिल्म “कागज” भले ही मृत व्यक्ति को जिंदा साबित करने की जद्दोजहद के संघर्ष की कहानी कहती हो, लेकिन हकीकत में उसके मायने काफी गहरे हैं, जो आज आये दिन देश के अलग-अलग कोर्ट या प्रशासनिक हलकों में सुनायी पड़ते हैं। सरकारी रिकॉर्ड में गलती किसी की जिंदगी पर कितना बड़ा असर डाल सकती है, इसका हैरान करने वाला मामला छत्तीसगढ़ में भी सामने आया है। जशपुर जिले के एक कोटवार को सरकारी रिकॉर्ड में मृत मानकर उसकी नियुक्ति ही निरस्त कर दी गई, जबकि वह पूरी तरह जीवित था और अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहा था।
मामला जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचा और कर्मचारी स्वयं अदालत में उपस्थित हुआ, तब प्रशासनिक लापरवाही की परतें खुलीं।हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए सरगुजा संभाग के कमिश्नर का आदेश रद्द कर दिया और पूरे मामले की दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी जीवित व्यक्ति को मृत मानकर पारित किया गया आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।
क्या है पूरा मामला?
इस मामले को लेकर जशपुर जिले की मनोरा तहसील के ग्राम गजमा निवासी मरियानुस एक्का ग्राम पंचायत में कोटवार के पद पर कार्यरत थे। उनकी नियुक्ति को सुबोध कुमार तिर्की ने अनुविभागीय अधिकारी (SDO) के समक्ष चुनौती दी थी।एसडीओ ने आपत्ति खारिज कर दी, लेकिन इसके बाद मामला अपील के रूप में सरगुजा कमिश्नर के पास पहुंचा। लेकिन वहां भी फरियादी को राहत नहीं मिली।
कमिश्नर ने माना- कर्मचारी की हो चुकी है मौत
18 जून 2018 को सरगुजा कमिश्नर ने आदेश पारित करते हुए कहा कि मरियानुस एक्का का निधन हो चुका है, इसलिए उनकी नियुक्ति स्वतः समाप्त मानी जाएगी। इसी आधार पर उनकी नियुक्ति निरस्त कर दी गई।यही आदेश बाद में पूरे विवाद की वजह बना।
हाईकोर्ट पहुंचा ‘मृत घोषित’ कर्मचारी
कमिश्नर के आदेश से हैरान मरियानुस एक्का ने अधिवक्ता राजेंद्र पटेल के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की।सुनवाई के दौरान जब मरियानुस एक्का स्वयं कोर्ट में उपस्थित हुए, तब अदालत के सामने स्पष्ट हो गया कि सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें गलत तरीके से मृत दर्ज कर लिया गया था।यह घटनाक्रम अदालत के लिए भी असामान्य और गंभीर था।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा जवाब
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य शासन से जवाब तलब किया।सरकारी अधिवक्ता केशव गुप्ता ने जांच के बाद अदालत को बताया कि मरियानुस एक्का वास्तव में जीवित हैं।राज्य सरकार की इस स्वीकारोक्ति के बाद प्रशासनिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए कि बिना सत्यापन के इतना महत्वपूर्ण आदेश कैसे पारित किया गया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने कहा कि:
- किसी जीवित व्यक्ति को मृत मानकर पारित आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।
- इस प्रकार का आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
- मामले की दोबारा मेरिट के आधार पर सुनवाई की जानी चाहिए।
कोर्ट ने सरगुजा कमिश्नर का आदेश निरस्त करते हुए मामला पुनः सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।
19 अगस्त को फिर होगी सुनवाई
हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार अब 19 अगस्त 2026 को सभी पक्षकार सरगुजा कमिश्नर के समक्ष उपस्थित होंगे। वहां पूरे मामले की नए सिरे से सुनवाई होगी और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला केवल एक कर्मचारी को राहत देने तक सीमित नहीं है। यह प्रशासनिक तंत्र को भी स्पष्ट संदेश देता है कि तथ्यों की पुष्टि किए बिना किसी व्यक्ति के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला आदेश पारित नहीं किया जा सकता। सरकारी रिकॉर्ड की एक गंभीर त्रुटि किसी नागरिक की नौकरी और अधिकार दोनों को प्रभावित कर सकती है।
जानिये क्या हैं इस फैसले की 5 बड़ी बातें-
- सरकारी रिकॉर्ड में जीवित कर्मचारी को मृत घोषित कर दिया गया।
- उसी आधार पर उसकी कोटवार पद की नियुक्ति निरस्त कर दी गई।
- कर्मचारी खुद हाईकोर्ट पहुंचा तो प्रशासनिक गलती सामने आई।
- राज्य सरकार ने कोर्ट में स्वीकार किया कि कर्मचारी जीवित है।
- हाईकोर्ट ने कमिश्नर का आदेश रद्द कर दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए।
FAQ
प्रश्न: मामला किस जिले का है?
उत्तर: जशपुर जिले की मनोरा तहसील के ग्राम गजमा का।
प्रश्न: कर्मचारी किस पद पर कार्यरत था?
उत्तर: ग्राम पंचायत में कोटवार के पद पर।
प्रश्न: हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया?
उत्तर: सरगुजा कमिश्नर का आदेश रद्द करते हुए मामले की दोबारा मेरिट पर सुनवाई के निर्देश दिए।
प्रश्न: अगली सुनवाई कब होगी?
उत्तर: 19 अगस्त 2026 को सरगुजा कमिश्नर के समक्ष।










