चार साल पहले शुरू हुई पहल आज भी जारी, 618 सदस्य मिलकर निभा रहे इंसानियत की जिम्मेदारी; दिवंगत दीनालाल लोई के परिजनों को दी 50 हजार की सहायता
सारंगढ़-बिलाईगढ़। कौन कहता है संगठन सिर्फ मांगों और अधिकारों की लड़ाई लड़ने का माध्यम होता है, जरूरत के वक्त में ये संगठन अपने साथियों और उनके परिवारों के साथ खड़े होने का नाम भी है। छत्तीसगढ़ प्रदेश संयुक्त शिक्षक संघ, जिला सारंगढ़-बिलाईगढ़ ने अपने सामाजिक सरोकारों के जरिए इसी भावना को एक मिसाल में बदल दिया है। संगठन की “संवेदना” योजना आज उसके सांगठनिक दायित्व से आगे बढ़कर इंसानियत और अपनत्व की पहचान बन चुकी है।
कोरोना महामारी की दूसरी लहर में विकासखंड के 21 शिक्षक साथियों के असमय निधन ने संगठन को भीतर तक झकझोर दिया था। इसी पीड़ा से जन्मी “संवेदना” योजना के तहत संगठन के करीब 618 सदस्य अपने किसी शिक्षक साथी के असमय निधन पर उसके परिवार के साथ खड़े होते हैं।
इस योजना के तहत दिवंगत शिक्षक के परिजनों को दशकर्म तक 50 हजार रुपये की नकद सहायता दी जाती है। साथ ही दिवंगत साथी की स्मृति को संजोए रखने के लिए उनकी मुद्रित छवि भी परिवार को सौंपी जाती है।
चार साल से जारी है संवेदना की यह परंपरा
संगठन के अनुसार पिछले करीब चार वर्षों से यह सिलसिला लगातार जारी है। अब तक 10 दिवंगत शिक्षक साथियों के परिवारों तक संगठन संवेदना पहुंचा चुका है।
इनमें स्वर्गीय राजाराम यादव, द्वारका पटेल, बहादुर सिंह उरांव, विवेक सिदार, विद्याधर पटेल, अमी लाल सिदार, शिवलाल सिदार, बसंत सिदार, भगत राम पटेल और अनुराग सिंह सिदार के परिवार शामिल हैं।
संगठन की भूमिका केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रही। कई मामलों में पीड़ित परिवारों को अनुकंपा नियुक्ति दिलाने में भी संगठन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे परिवार को कठिन समय में आर्थिक सहारा मिल सका।
45 साल की उम्र में दीनालाल लोई ने दुनिया को कहा अलविदा
इसी संवेदना की कड़ी में इस बार संगठन को अपने युवा साथी दीनालाल लोई के निधन का दुख झेलना पड़ा।
श्री लोई शासकीय प्राथमिक विद्यालय चंदली में सहायक शिक्षक के पद पर कार्यरत थे। वे लंबे समय से क्षय रोग (टीबी) से पीड़ित थे। लगातार उपचार और चिकित्सकीय प्रयासों के बावजूद जिंदगी की जंग हार गए।
25 अगस्त 2026 को महज 45 वर्ष की उम्र में उनके निधन की खबर ने शिक्षक समुदाय को गहरे दुख में डाल दिया। एक युवा शिक्षक का इस तरह असमय चले जाना उनके परिवार के साथ-साथ साथियों के लिए भी बेहद पीड़ादायक रहा।
दशकर्म पर घर पहुंचा शिक्षक संघ, परिवार को दिया संबल
दिवंगत दीनालाल लोई के दशकर्म के अवसर पर संयुक्त शिक्षक संघ परिवार, सारंगढ़-बिलाईगढ़ उनके गृहग्राम जम्हारी, विकासखंड सरायपाली, जिला महासमुंद पहुंचा।
यहां संगठन की ओर से स्वर्गीय लोई को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इसके बाद “संवेदना” योजना की परंपरा के अनुरूप उनके पिता श्री मनीराम लोई और धर्मपत्नी श्रीमती लता लोई को 50 हजार रुपये की नकद सहायता राशि प्रदान की गई। साथ ही स्वर्गीय दीनालाल लोई की मुद्रित छवि भी परिजनों को सौंपी गई।
यह सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं थी, बल्कि उस परिवार के लिए यह संदेश भी था कि दुख की इस घड़ी में वे अकेले नहीं हैं और उनके साथियों का संगठन उनके साथ खड़ा है।
“संवेदना” सिर्फ राशि नहीं, रिश्ते निभाने का संकल्प
इस अवसर पर सहायक विकासखंड शिक्षा अधिकारी श्री आरके डोंगरे एवं जिलाध्यक्ष श्री चोखलाल पटेल ने परिजनों को सहायता राशि और दिवंगत शिक्षक की मुद्रित छवि प्रदान की।
वहीं ब्लॉक अध्यक्ष श्री कौशल कुमार पटेल ने स्वर्गीय दीनालाल लोई को याद करते हुए उनकी सेवाओं और उनके व्यक्तित्व को स्मरण किया। उन्होंने शोकाकुल परिजनों को इस कठिन समय में संबल प्रदान किया।
श्रद्धांजलि देने बड़ी संख्या में पहुंचे शिक्षक साथी
दिवंगत शिक्षक को श्रद्धांजलि देने और परिवार के साथ खड़े होने के लिए संगठन के कई पदाधिकारी और शिक्षक साथी मौजूद रहे।
इस अवसर पर पंचराम साहू, नीलकंठ पटेल, अयोध्या प्रसाद जायसवाल, शिव प्रकाश राठिया, रामकिशोर पटेल, दारा सिंह सिदार, दीपक कुमार भगत, संतोष मेहर, मोहिंदर सिंह मरावी, अनिल कुमार साहू, जयंत राठिया, जय प्रकाश बढ़ई, फुलेश्वर यादव, शिवनन्दन जायसवाल, फुलेश्वर भोई, सुभाष बरिहा, पदमन पटेल, दिनेश बरिहा और प्रधान पाठक श्री जसराज साहू सहित अन्य शिक्षक उपस्थित रहे।
दुख की घड़ी में साथ खड़ा होना ही संगठन की असली ताकत
दीनालाल लोई के परिवार को दी गई यह सहायता उस सोच को सामने लाती है, जिसमें संगठन अपने सदस्यों को सिर्फ सेवा में सहकर्मी नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा मानता है।
किसी परिवार के लिए अपने सदस्य को खोने का दुख किसी आर्थिक सहायता से कम नहीं हो सकता। लेकिन दुख की उस घड़ी में साथियों का घर तक पहुंचना, दिवंगत की स्मृति को सम्मान देना और परिवार को यह भरोसा दिलाना कि वे अकेले नहीं हैं—यही “संवेदना” की असली ताकत है।
चार साल पहले कोरोना की त्रासदी से निकली एक पीड़ा आज एक ऐसी मानवीय परंपरा बन गई है, जिसमें संगठन अपने दिवंगत साथियों को श्रद्धांजलि देने के साथ उनके परिवारों की जिम्मेदारी में भी अपना हिस्सा निभा रहा है। यही वजह है कि संयुक्त शिक्षक संघ की “संवेदना” आज संगठन की पहचान बनती जा रही है।










