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मुकदमे पर मुकदमा, फिर हाई कोर्ट ने खत्म किया रिश्ता! पति को मिला तलाक, लगातार कानूनी लड़ाई को माना मानसिक क्रूरता

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पति की तलाक याचिका मंजूर करते हुए विवाह समाप्त कर दिया। दहेज और घरेलू हिंसा मामलों में लगातार कानूनी कार्यवाही को इस मामले में मानसिक क्रूरता माना गया।

October 7, 2026 4:11 AM
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बिलासपुर: पति-पत्नी का रिश्ता जब अदालत पहुंचा तो मामला सिर्फ तलाक की अर्जी तक सीमित नहीं रहा। दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा, बरी होने के बाद अपील और फिर लगातार कानूनी कार्यवाही का सिलसिला चलता रहा। आखिरकार यह मामला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने पति को तलाक की मंजूरी देते हुए विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।

हाई कोर्ट ने इस मामले की परिस्थितियों में पति और उसके परिवार के खिलाफ लगातार चलती रही कानूनी कार्यवाही को मानसिक क्रूरता माना। हालांकि अदालत ने यह भी साफ किया कि केवल शिकायत दर्ज कराना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं है।जांजगीर निवासी विशंभर प्रसाद राठौर (29) की याचिका मंजूर करते हुए न्यायमूर्ति पार्थ प्रतिम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की युगलपीठ ने उनकी पत्नी मनीषा राठौर (30) से हुआ विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।

2015 में शादी, फिर रिश्ते में बढ़ता गया विवाद

बताया जा रहा है कि दोनों की शादी 2 जून 2015 को हुई थी। पति का कहना था कि शादी के बाद पत्नी कुछ समय ही ससुराल में रही और इसके बाद दोनों के बीच विवाद बढ़ने लगे।पति ने पत्नी पर दुर्व्यवहार, गाली-गलौज और घर में अशांति पैदा करने के आरोप लगाए।

उसने यह भी दावा किया कि पत्नी की मानसिक बीमारी की जानकारी उससे विवाह से पहले छिपाई गई थी।इन्हीं आधारों पर पति ने तलाक की मांग की थी।लेकिन परिवार न्यायालय ने 8 अगस्त 2019 को पति की दलीलों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं माना और तलाक की अर्जी खारिज कर दी।

दहेज केस में पति समेत सात लोग हुए बरी

मामला यहीं नहीं रुका। पत्नी की शिकायत पर पति और उसके परिवार के छह अन्य सदस्यों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला चला।कुल सात आरोपितों को 14 दिसंबर 2023 को अदालत ने बरी कर दिया।इसके बाद पत्नी की ओर से इस फैसले को चुनौती दी गई, लेकिन यह अपील भी 7 मार्च 2025 को खारिज हो गई। यानी जिस मामले में पति और उसके परिवार के छह अन्य सदस्य आरोपित बने थे, उसमें पहले बरी होने का फैसला आया और बाद की अपील में भी उन्हें राहत बरकरार रही।

घरेलू हिंसा का मामला भी नहीं पहुंचा मंजिल तक

इसके अलावा पत्नी ने घरेलू हिंसा कानून के तहत भी आवेदन किया था। यह आवेदन भी खारिज हो गया और इसकी अपील 23 अगस्त 2024 को निरस्त कर दी गई।पति ने इन बाद के न्यायिक फैसलों को हाई कोर्ट में तलाक की अपील के दौरान रिकॉर्ड पर रखा।यहीं से मामले का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू सामने आया।

हाई कोर्ट ने कहा- शिकायत करना गलत नहीं, लेकिन पूरा घटनाक्रम देखना होगा

हाई कोर्ट ने साफ किया कि किसी व्यक्ति का शिकायत दर्ज कराना या कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि अगर शिकायत के बाद मुकदमा चले, पति और उसके परिवार के सदस्य बरी हो जाएं और उसके बाद भी उन फैसलों को लगातार चुनौती देकर कानूनी कार्यवाही जारी रखी जाए, तो पूरे घटनाक्रम को वैवाहिक रिश्ते की पृष्ठभूमि में देखना जरूरी है।इस मामले में हाई कोर्ट ने माना कि लगातार चलती रही कानूनी कार्यवाही से पति को मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और तनाव हुआ। परिस्थितियों को देखते हुए इसे मानसिक क्रूरता माना गया।

मुकदमा अधिकार था, लेकिन असर वैवाहिक रिश्ते पर पड़ा

अदालत के फैसले को आसान भाषा में समझें तो हाई कोर्ट ने यह नहीं कहा कि पत्नी को शिकायत करने का अधिकार नहीं था। अदालत ने शिकायत और उसके बाद की पूरी न्यायिक प्रक्रिया को एक साथ देखा।पति और उसके परिवार के सदस्यों के बरी होने, उसके बाद अपील खारिज होने और घरेलू हिंसा मामले में भी राहत नहीं मिलने के बावजूद कानूनी लड़ाई जारी रहने के प्रभाव को अदालत ने वैवाहिक रिश्ते के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।यही वह बिंदु रहा, जिसने पति की तलाक की मांग को मजबूती दी।

मानसिक बीमारी की दलील पर पति को नहीं मिली राहत

पति ने पत्नी की मानसिक बीमारी को भी तलाक का आधार बनाया था। लेकिन इस दलील को हाई कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया।अदालत के सामने डॉक्टर की राय थी कि बीमारी का इलाज संभव है और उपचार के बाद पत्नी सामान्य वैवाहिक जीवन जी सकती है। यह भी पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुआ कि बीमारी विवाह से पहले से इतनी गंभीर थी कि पति से पत्नी के साथ रहना अपेक्षित ही न हो।इसलिए मानसिक बीमारी तलाक का आधार नहीं बनी।

आखिरकार हाई कोर्ट ने विवाह ही खत्म कर दिया

परिवार न्यायालय के 8 अगस्त 2019 के फैसले को हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया और 2 जून 2015 को हुआ विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।इस मामले में तलाक का आधार पत्नी की कथित मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि मामले की विशेष परिस्थितियों में लगातार कानूनी कार्यवाही से पति को हुई मानसिक पीड़ा और तनाव को मानसिक क्रूरता माना जाना रहा।

कानूनी लड़ाई की भी एक सीमा?

इस फैसले का सबसे अहम संदेश यही है कि अदालत ने शिकायत करने के अधिकार पर सवाल नहीं उठाया। लेकिन वैवाहिक विवाद में मुकदमों और अपीलों की पूरी श्रृंखला का असर भी अदालत की नजर से छिपा नहीं रहा।रिश्ता बचाने की कोशिश कब मुकदमों की लंबी लड़ाई में बदल गई और आखिरकार उसी कानूनी लड़ाई ने तलाक का रास्ता खोल दिया—इस मामले में हाई कोर्ट ने इसी पूरे घटनाक्रम को मानसिक क्रूरता के नजरिए से देखा।

Gitendra Sahu

Gitendra Kumar Sahu has over 10 years of experience in journalism and newsroom operations. He has worked with reputed media organizations such as Swaraj Express and Press Trust of India (PTI), where he spent nearly five years in active journalism. He has also worked with several digital media platforms and possesses extensive experience in both field reporting and newsroom desk operations. After completing his graduation, he chose journalism as his professional career. He specializes in political reporting, current affairs, and crime journalism, with strong expertise in breaking and handling major news stories.

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