बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता रियाजुल बारी को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ जारी आरोप पत्र और उसके आधार पर शुरू की गई विभागीय कार्यवाही को निरस्त कर दिया है। मामला प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत कथित वित्तीय अनियमितताओं और भुगतान में गड़बड़ी के आरोपों से जुड़ा था। अदालत ने याचिकाकर्ता की याचिका स्वीकार कर ली।
रियाजुल बारी छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में मुख्य अभियंता के पद पर कार्यरत थे। वे 30 जून 2023 को सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अवर सचिव ने 21 अप्रैल 2026 को उनके खिलाफ आरोप पत्र जारी किया था। इसमें अतिरिक्त निष्पादन सुरक्षा राशि (APS), सुरक्षा निधि (SD), निष्पादन गारंटी (PG), रॉयल्टी और जीएसटी से संबंधित राशि के दुरुपयोग तथा अनियमित भुगतान के आरोप लगाए गए थे।
सेवानिवृत्ति के बाद जारी हुआ था आरोप पत्र
विभागीय आरोप पत्र में कहा गया था कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत शासकीय राशि के भुगतान में अनियमितताएं हुईं और संबंधित अधिकारी ने अपने पदेन दायित्वों का नियमानुसार निर्वहन नहीं किया। इसे छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम, 1965 के विपरीत बताया गया था।
इस कार्रवाई से असंतुष्ट रियाजुल बारी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनकी ओर से अधिवक्ता शिबाशीष मिश्रा के माध्यम से मामला प्रस्तुत किया गया। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी और अधिवक्ता जैनब मुस्तफा वनक ने याचिकाकर्ता का पक्ष रखा।
राज्यपाल की मंजूरी का उठाया गया मुद्दा
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि रियाजुल बारी ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में चार दशक से अधिक समय तक सेवा दी और सेवानिवृत्ति से पहले विभाग ने उन्हें अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) भी जारी किया था। इसमें उनके विरुद्ध किसी विभागीय जांच या प्रतिकूल मामले के लंबित नहीं होने की बात कही गई थी।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू करने के लिए छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियम, 1976 के नियम 9 का पालन अनिवार्य है। विशेष रूप से नियम 9(2)(b)(i) के तहत राज्यपाल की मंजूरी आवश्यक होने की दलील दी गई।
अधिवक्ताओं के अनुसार, संबंधित मामले में इस अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि केवल मुख्यमंत्री की मंजूरी के आधार पर राज्यपाल की मंजूरी से संबंधित वैधानिक आवश्यकता को समाप्त नहीं किया जा सकता, जब तक नियम में विधिवत संशोधन न किया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के मीरा साहनी बनाम दिल्ली मामले सहित हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला दिया। उनका तर्क था कि पेंशन नियमों में निर्धारित अनिवार्य शर्तों का पालन किए बिना सेवानिवृत्त कर्मचारी के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती।
उन्होंने दलील दी कि किसी वैधानिक नियम में बदलाव किए बिना कार्यकारी निर्देश या सर्कुलर के जरिए नियम में निर्धारित प्रक्रिया को बदला नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने आरोप पत्र और विभागीय कार्यवाही की निरस्त
इन दलीलों पर विचार करने के बाद न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की अदालत ने रियाजुल बारी के खिलाफ 21 अप्रैल 2026 को जारी आरोप पत्र और उसके आधार पर शुरू की गई विभागीय कार्यवाही को निरस्त कर दिया। अदालत ने याचिका स्वीकार कर ली।
इस आदेश से रियाजुल बारी को सेवानिवृत्ति के बाद शुरू की गई विभागीय कार्रवाई के मामले में राहत मिली है।










