बिलासपुर। छत्तीसगढ़ शिक्षक भर्ती में कानूनी पेंच फंसता जा रहा है। दिव्यांग अभ्यर्थियों को राहत के बाद अब आरक्षित वर्ग को लेकर भी अहम निर्णय लिया है। छत्तीसगढ़ में सहायक शिक्षक भर्ती के तहत आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को न्यूनतम शैक्षणिक अंकों में पांच प्रतिशत छूट देने के मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की पीठ ने स्पष्ट किया कि भर्ती एजेंसी को हाई कोर्ट के पूर्व फैसले और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) की 29 जुलाई 2011 की अधिसूचना का सख्ती से पालन करना होगा। हालांकि, फिलहाल नियमों के उल्लंघन का कोई वास्तविक मामला सामने नहीं आने के कारण कोर्ट ने याचिका को समयपूर्व मानते हुए निराकृत कर दिया।
भर्ती विज्ञापन में छूट का स्पष्ट उल्लेख नहीं होने पर उठाए सवाल
बिलासपुर जिले की मस्तूरी तहसील निवासी पुष्पा देवी ने 28 जुलाई 2026 को जारी सहायक शिक्षक भर्ती के विज्ञापन को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अभ्यर्थियों को न्यूनतम शैक्षणिक अंकों में पांच प्रतिशत की छूट देने का प्रावधान भर्ती विज्ञापन में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है।
याचिका में यह भी कहा गया कि ऑनलाइन आवेदन पोर्टल पर इस छूट का लाभ लेने के लिए आवश्यक व्यवस्था नहीं होने के कारण आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को आवेदन करने में परेशानी हो रही है। इससे पात्र उम्मीदवारों के अधिकार प्रभावित होने की आशंका जताई गई।
10 फरवरी 2023 के फैसले का दिया हवाला
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि हाई कोर्ट की पीठ ने 10 फरवरी 2023 को रिट अपील और संबंधित मामलों में दिए गए फैसले में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को न्यूनतम शैक्षणिक अंकों में पांच प्रतिशत छूट का पात्र माना था।
इसके अलावा, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की 29 जुलाई 2011 की अधिसूचना में भी इस संबंध में प्रावधान होने की बात कही गई। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि वर्ष 2019 की भर्ती के मामले में राज्य सरकार ने 2 सितंबर 2025 के आदेश से ऐसी छूट लागू की थी। इसके बावजूद 2026 की भर्ती के विज्ञापन और ऑनलाइन आवेदन पोर्टल में छूट का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया।
शासन ने कहा- याचिका समय से पहले
राज्य शासन की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि भर्ती विज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि अभ्यर्थियों की पात्रता निर्धारित करते समय न्यायालय के फैसलों और संबंधित अधिसूचनाओं का पालन किया जाएगा।
शासन का तर्क था कि जब भर्ती प्रक्रिया में न्यायालय के आदेशों और लागू नियमों का पालन करने की बात स्पष्ट रूप से कही गई है, तो यह मान लेना उचित नहीं होगा कि भर्ती एजेंसी इनका पालन नहीं करेगी। इसी आधार पर शासन ने याचिका को समयपूर्व बताया।
नियमों का उल्लंघन होने पर दोबारा हाई कोर्ट जा सकेंगी याचिकाकर्ता
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि भर्ती विज्ञापन में न्यायालय के पूर्व फैसलों और एनसीटीई की अधिसूचना का पालन करने की बात स्पष्ट है। ऐसे में भर्ती एजेंसी के लिए इनका पालन करना अनिवार्य होगा।
कोर्ट ने माना कि फिलहाल याचिकाकर्ता के साथ किसी वास्तविक अन्याय या नियमों के उल्लंघन की स्थिति सामने नहीं आई है। इसलिए इस स्तर पर याचिका समय से पहले दायर की गई है।हालांकि, हाई कोर्ट ने पुष्पा देवी को स्वतंत्रता दी है कि यदि भर्ती एजेंसी पूर्व फैसले और एनसीटीई की अधिसूचना के अनुरूप कार्रवाई नहीं करती है और इससे उनके अधिकार प्रभावित होते हैं, तो वह दोबारा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती हैं।
अभ्यर्थियों के लिए अहम बात: हाई कोर्ट की टिप्पणी के अनुसार, भर्ती एजेंसी को आरक्षित वर्ग के पात्र अभ्यर्थियों के मामले में लागू न्यायिक फैसलों और एनसीटीई की अधिसूचना का पालन करना होगा। हालांकि, इस आदेश में याचिकाकर्ता को तत्काल राहत देने के बजाय नियमों का उल्लंघन होने पर दोबारा अदालत आने की स्वतंत्रता दी गई है।







