बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दो पत्नी के विवाद को लेकर अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद के निपटारे को लेकर भी अहम आदेश दिया हैं। राजनांदगांव के दिवंगत सरकारी कर्मचारी सुखीदास कुर्रे की संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि सुखीदास की मृत्यु के समय दोनों महिलाओं को वैध पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
हालांकि, दोनों महिलाओं से जन्मे उनके तीनों बच्चों को पिता की जमीन और मकान सहित अचल संपत्ति में बराबर हिस्सा मिलेगा। वहीं, वेतन, पेंशन, सामान्य भविष्य निधि (जीपीएफ), उपादान और अन्य सेवा लाभों की करीब 17 लाख रुपये की राशि हासिल करने के लिए अलग कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी।न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की खंडपीठ ने 13 अक्टूबर को दोनों महिलाओं की याचिकाओं का निराकरण करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले में संशोधन किया।
क्या है पूरा मामला?
सुखीदास कुर्रे पशु चिकित्सा विभाग में सहायक क्षेत्र अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। उनकी मृत्यु 12 अगस्त 2015 को हुई थी। उनकी पहली पत्नी के रूप में दावा करने वाली शोभा साहू से एक बेटा अविनाश है, जबकि अशोक लता कुर्रे से दो बेटियां लक्ष्मी और बेबी उर्फ दीपिका हैं।सुखीदास की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति और नौकरी से जुड़े सेवा लाभों पर अधिकार को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद शुरू हुआ। दोनों महिलाओं ने अपने-अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज और दलीलें पेश कीं।
पहली शादी, सहमतिनामा और दूसरे विवाह पर विवाद
अशोक लता और उनकी बेटियों की ओर से दलील दी गई कि शोभा ने 10 जुलाई 2000 को एक सहमतिनामे के जरिए सुखीदास से अलग होने की बात स्वीकार की थी। इसके बाद शोभा ने अरुण साहू से विवाह कर लिया था।दूसरी ओर, शोभा ने पहले विवाह के विधिवत समाप्त होने पर सवाल उठाया।
उनका कहना था कि अशोक लता का भी अपने पहले पति धनेश कोसले से तलाक नहीं हुआ था। ऐसे में सुखीदास के साथ अशोक लता का विवाह वैध नहीं माना जा सकता।हाई कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि दोनों महिलाओं की वैवाहिक स्थिति और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर सुखीदास की संपत्ति तथा सेवा संबंधी लाभों पर किसका अधिकार बनता है।
सेवा अभिलेखों में अरुण साहू का नाम भी बना अहम आधार
हाई कोर्ट ने मामले से जुड़े दस्तावेजों और गवाहियों पर विचार किया। शोभा के सेवा संबंधी अभिलेखों में अरुण साहू का नाम पति के रूप में दर्ज था। सेवा पुस्तिका में अरुण की तस्वीर भी थी और उन्हें सेवा लाभों के लिए नामांकित किया गया था।
कोर्ट ने इन तथ्यों को महत्वपूर्ण माना। सहमतिनामे और सेवा अभिलेखों से जुड़े तथ्यों को देखते हुए शोभा के दावे पर विचार किया गया। वहीं, अशोक लता ने स्वीकार किया था कि उनका पहले पति धनेश कोसले से विवाह विच्छेद नहीं हुआ था।इन परिस्थितियों के आधार पर हाई कोर्ट ने सुखीदास की मृत्यु के समय दोनों महिलाओं को उनकी वैध पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं किया।
तीनों बच्चों को जमीन और मकान में बराबर हिस्सा
फैसले का अहम पहलू यह है कि माता की वैवाहिक स्थिति से जुड़े विवाद के बावजूद तीनों बच्चों के संपत्ति संबंधी अधिकारों को अलग आधार पर देखा गया।हाई कोर्ट ने पाया कि अविनाश, लक्ष्मी और बेबी उर्फ दीपिका, तीनों सुखीदास की संतान हैं। उनकी संतान होने को लेकर पक्षों के बीच विवाद नहीं था। इसलिए कोर्ट ने तीनों बच्चों को सुखीदास की अचल संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी देने का निर्णय किया।
इसमें जमीन और मकान जैसी संपत्ति शामिल है। यानी किसी एक महिला के दावे के आधार पर पूरी अचल संपत्ति पर अकेले अधिकार स्वीकार नहीं किया गया। तीनों बच्चों को बराबर हिस्सा देने का फैसला उनके पिता की संतान होने के आधार पर किया गया।
17 लाख रुपये के सेवा लाभों के लिए क्या करना होगा?
सुखीदास के वेतन, पेंशन, सामान्य भविष्य निधि, उपादान और अन्य सेवा संबंधी लाभों की करीब 17 लाख रुपये की राशि को लेकर भी विवाद था।हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन सेवा लाभों की राशि हासिल करने के लिए केवल संपत्ति में अधिकार की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी।
इसके लिए संबंधित पक्षों को उचित कानूनी राहत मांगनी होगी और नियमानुसार न्यायालय शुल्क जमा करना होगा। उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की आवश्यकता होने पर सक्षम न्यायालय से उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया भी अपनानी होगी।इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया गया, जिसमें सेवा संबंधी राशि पर अधिकार घोषित किया गया था।
फैसले का क्या है मतलब?
हाई कोर्ट के इस फैसले में दो महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं। पहली, सुखीदास की मृत्यु के समय दोनों महिलाओं को वैध पत्नी का दर्जा नहीं दिया गया। दूसरी, इससे तीनों बच्चों का अचल संपत्ति में बराबर हिस्से का अधिकार प्रभावित नहीं हुआ।
हालांकि, करीब 17 लाख रुपये के सेवा संबंधी लाभों के लिए अलग कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इस तरह कोर्ट ने अचल संपत्ति में बच्चों के अधिकार और सरकारी सेवा से जुड़े बकाया लाभों के दावे को अलग-अलग आधार पर देखा।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राजनांदगांव के दिवंगत सरकारी कर्मचारी सुखीदास कुर्रे की अचल संपत्ति में उनके तीनों बच्चों को बराबर हिस्सा देने का फैसला किया है। दोनों महिलाओं को वैध पत्नी का दर्जा नहीं मिला, जबकि करीब 17 लाख रुपये के सेवा लाभों के लिए अलग कानूनी प्रक्रिया अपनाने की जरूरत बताई गई है।










