Tijan Bai No more: विश्व प्रसिद्ध पंडवानी गायिका, पद्म विभूषण एवं पद्मश्री से सम्मानित डॉ. तीजन बाई का रविवार को उनके पैतृक गांव गनियारी में पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। हजारों लोगों, लोक कलाकारों, शिष्यों, जनप्रतिनिधियों और प्रशंसकों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। उनके निधन से न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि भारतीय लोकसंगीत जगत ने अपनी सबसे प्रभावशाली आवाजों में से एक को खो दिया।
लोकगीतों के बीच दी गई अंतिम विदाई
गृहग्राम गनियारी स्थित मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार के दौरान वातावरण बेहद भावुक हो गया। पारंपरिक श्रद्धांजलि स्वरूप लोक कलाकारों और उनके शिष्यों ने “चोला माटी के हे राम, एकर का भरोसा…” गीत गाकर अपनी प्रिय गुरु को अंतिम प्रणाम किया। डॉ. तीजन बाई के मंझले बेटे दिलहरण पारधी ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान उनके पति तुलसी राम देशमुख सहित पूरा परिवार मौजूद रहा। परिजनों ने बताया कि डॉ. तीजन बाई की अंतिम इच्छा थी कि वे सुहागिन के रूप में ही इस संसार से विदा लें, जिसे परिवार ने पूर्ण सम्मान के साथ पूरा किया।
संघर्षों से विश्व मंच तक का अद्भुत सफर
8 अगस्त 1956 को भिलाई के समीप स्थित गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई का बचपन आर्थिक अभावों के बीच बीता। उन्हें औपचारिक शिक्षा नहीं मिली, लेकिन उनके नाना द्वारा सुनाई गई महाभारत की कथाओं ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी। ये भी संयोग ही है कि जिस शख्शियत के पास औपचारिक शिक्षा के नाम पर पहली कक्षा तक का सर्टिफिकेट हो, उन्हें अलग-अलग विश्वविद्यालयों ने कई डाक्टरेट की उपाधि दी।
महज 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए सार्वजनिक मंचों पर पंडवानी गायन शुरू किया। इसके कारण उन्हें सामाजिक बहिष्कार भी झेलना पड़ा, लेकिन उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने तंबूरे और कला का साथ नहीं छोड़ा।
पंडवानी को दी नई पहचान
तीजन बाई ने पंडवानी की पारंपरिक ‘वेदमती’ शैली, जिसमें बैठकर गायन किया जाता था, को छोड़कर पुरुष कलाकारों द्वारा अपनाई जाने वाली ‘कापालिक शैली’ को अपनाया। खड़े होकर अभिनय के साथ महाभारत की कथा प्रस्तुत करने की उनकी अनूठी शैली ने पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
उनके हाथों का तंबूरा कभी भीम की गदा तो कभी अर्जुन का गांडीव बन जाता था। यही जीवंत प्रस्तुति उन्हें भारत ही नहीं, बल्कि पेरिस, लंदन, टोक्यो सहित दुनिया के कई देशों के प्रतिष्ठित मंचों तक ले गई।
इंदिरा गांधी से मिली राष्ट्रीय पहचान
डॉ. तीजन बाई के जीवन में बड़ा मोड़ तब आया, जब प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समक्ष उनकी प्रस्तुति ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई।बाद में निर्देशक श्याम बेनेगल के चर्चित धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ में उनकी उपस्थिति ने उन्हें घर-घर तक पहुंचा दिया। वर्ष 1986 में वे भिलाई इस्पात संयंत्र (सेल) से जुड़ीं और पद्म सम्मान पाने वाली सेल की पहली महिला कर्मचारी बनने का गौरव भी हासिल किया।
सम्मानों से सजा गौरवशाली जीवन
भारतीय लोककला को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए डॉ. तीजन बाई को अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। उन्हें 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, गांधी रत्न सम्मान और जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
हमेशा गूंजती रहेगी तीजन बाई की आवाज
डॉ. तीजन बाई का निधन भारतीय लोककला के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने पंडवानी को गांव की चौपाल से निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्वभर में नई पहचान दिलाई। उनकी सशक्त आवाज, जीवंत अभिनय और संघर्ष से भरा जीवन आने वाली पीढ़ियों के कलाकारों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।










