रायपुर। परंपरागत हुनर जब आधुनिक तकनीक से जुड़ता है तो बदलाव की नई कहानी जन्म लेती है। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के फिंगेश्वर विकासखंड अंतर्गत ग्राम कोसमखुटा के कुम्हार नारद चक्रधारी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वर्षों से मिट्टी के बर्तन बनाकर परिवार का भरण-पोषण करने वाले नारद को अब इलेक्ट्रिक चाक मिलने से उनकी आजीविका को नई गति मिली है।
नारद बताते हैं कि पहले हाथ से चलने वाले पारंपरिक चाक पर घड़ा, मटका, सुराही, दीया, खिलौने, गमले और अन्य मिट्टी के बर्तन तैयार करने में काफी समय और मेहनत लगती थी। उत्पादन सीमित होने के कारण आय भी सीमित रहती थी। लेकिन इलेक्ट्रिक चाक मिलने के बाद उनकी कार्यक्षमता और उत्पादन में वृद्धि होगी।
वे पहले प्रतिमाह 10 से 12 हजार रुपये मूल्य के उत्पाद तैयार कर पाते थे, वहीं अब लगभग 20 हजार रुपये तक के उत्पाद बनाने लगे हैं। त्योहारों के मौसम, विशेषकर दीपावली के दौरान उनकी मासिक आय 22 से 25 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। नारद चक्रधारी कहते हैं कि इलेक्ट्रिक चाक ने न केवल उनका श्रम कम किया है, बल्कि उनके पारंपरिक व्यवसाय को अधिक व्यवस्थित और लाभकारी भी बनाया है। उनके लिए यह केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य की नई उम्मीद है।
कम मेहनत में कमाई दोगुनी
नारद चक्रधारी बताते हैं कि प्रदेश सरकार की योजना बहुत अच्छी है. पहले हम लोग हाथ वाले चाक से घुमाकर मिट्टी के बर्तन बनाते थे, जिसमें अधिक समय व मेहनत लगती थी और उत्पादन कम हो पाता था। पर अब इलेक्ट्रिक चाक मिलने के बाद से कम समय ज्यादा माल तैयार हो हो जाता है। जिससे मिट्टी के बर्तनों की मांग भी बढ़ी है और हमारी आमदनी भी दोगुनी हो गई है। हम परिवार का पालम पोषण अच्छे से कर पा रहे है। हम प्रदेश सरकार को धन्यवाद देते हैं।
क्या होता है इलेक्ट्रिक चाक
दरअसल इलेक्ट्रिकल चाक (Electric Pottery Wheel) बिजली से चलने वाली एक मशीन है, जिसका उपयोग कुम्हार मिट्टी के बर्तन, दीये, हांडी, और गमले बनाने के लिए करते हैं। पारंपरिक हाथ से चलने वाले चाक की तुलना में, यह मोटर से चलती है और कम मेहनत में कई गुना अधिक उत्पादन करने में मदद करती है। इस चाक में एक मोटर और स्पीड कंट्रोल स्विच (या पैडल) लगा होता है, जिससे बर्तन बनाते समय चाक की रफ्तार को आसानी से कम या ज्यादा किया जा सकता है।










