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Chhattisgarh High Court POCSO Doctor Judgment : नाबालिग की सोनोग्राफी करना ही अपराध की जानकारी नहीं, हाईकोर्ट ने कहा, डॉक्टर पर POCSO में कार्रवाई नहीं बनती

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल नाबालिग की सोनोग्राफी करने से डॉक्टर को यौन अपराध की जानकारी मानकर POCSO Act की धारा 21 के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती। जानिए पूरा फैसला।

July 23, 2026 3:53 AM
Highcourt News
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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने POCSO Act के तहत डॉक्टरों की कानूनी जिम्मेदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल किसी नाबालिग की सोनोग्राफी करने से यह नहीं माना जा सकता कि डॉक्टर को यौन अपराध की जानकारी थी। जब तक यह साबित न हो कि चिकित्सक को अपराध की वास्तविक जानकारी या उचित आशंका थी, तब तक उसके खिलाफ POCSO Act की धारा 21 के तहत सूचना नहीं देने का मामला नहीं बनता।

याचिका की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने राजनांदगांव की रेडियोलॉजिस्ट डॉ. आरती उइके के खिलाफ दायर पूरक आरोपपत्र (Supplementary Charge Sheet) और विशेष न्यायालय डोंगरगढ़ द्वारा 11 मार्च 2026 को पारित संज्ञान आदेश को निरस्त कर दिया।

जानिये क्या है पूरा मामला?

मामला राजनांदगांव जिले के बोरतलाव थाना क्षेत्र का है। यहां 15 वर्षीय किशोरी के आठ माह की गर्भवती होने का मामला सामने आने के बाद पुलिस ने मुख्य आरोपी के खिलाफ POCSO Act के तहत अपराध दर्ज किया था।जांच के दौरान पुलिस ने सोनोग्राफी करने वाली रेडियोलॉजिस्ट डॉ. आरती उइके को भी आरोपी बना लिया। आरोप था कि उन्होंने नाबालिग की गर्भावस्था की जानकारी होने के बावजूद पुलिस को इसकी सूचना नहीं दी, जबकि POCSO Act के तहत ऐसी जानकारी देना अनिवार्य है।

महिला डॉक्टर ने कोर्ट में क्या दलील दी?

डॉ. आरती उइके की ओर से हाई कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि उन्होंने PC-PNDT Act के सभी वैधानिक प्रावधानों का पालन किया था। रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि उन्हें यह जानकारी थी कि गर्भावस्था किसी यौन अपराध का परिणाम है।याचिका में कहा गया कि केवल सोनोग्राफी करना या गर्भावस्था की पुष्टि करना किसी यौन अपराध की जानकारी होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि POCSO Act की धारा 19 के तहत सूचना देने की बाध्यता तभी उत्पन्न होती है, जब संबंधित व्यक्ति को अपराध की वास्तविक जानकारी (Actual Knowledge) हो या अपराध होने की उचित आशंका (Reasonable Apprehension) हो।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

सिर्फ नाबालिग की सोनोग्राफी करने या गर्भावस्था का पता चल जाने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि डॉक्टर को यह भी पता था कि गर्भावस्था किसी यौन अपराध का परिणाम है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों Sister Tessy Jose, State of Haryana vs Bhajan Lal और Neeharika Infrastructure मामलों का उल्लेख किया।खंडपीठ ने कहा कि यदि प्रथम दृष्टया किसी अपराध के आवश्यक तत्व ही मौजूद नहीं हैं, तो ऐसी आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।

चार्जशीट और संज्ञान आदेश दोनों निरस्त

हाई कोर्ट ने डॉ. आरती उइके के खिलाफ दायर पूरक चार्जशीट और विशेष न्यायालय डोंगरगढ़ के संज्ञान आदेश को निरस्त कर दिया।हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले का मुख्य आरोपी के खिलाफ चल रहे POCSO मामले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रहेगी।

यह फैसला डॉक्टरों की कानूनी जिम्मेदारी और POCSO Act के तहत सूचना देने के दायित्व को स्पष्ट करता है। अदालत ने संकेत दिया कि किसी चिकित्सक के खिलाफ केवल अनुमान या परिस्थितियों के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती, बल्कि यह साबित होना आवश्यक है कि उसे यौन अपराध की वास्तविक जानकारी या उचित आशंका थी।

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