Bilaspur High Court Service Tax Case। अगर किसी व्यक्ति ने अपने नाम से कारोबार (प्रोपराइटरशिप फर्म) चलाया हो और उसकी मृत्यु हो जाए, तो क्या सरकार उसके परिवार या कानूनी वारिसों से बकाया सर्विस टैक्स वसूल सकती है? इस सवाल पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि जब तक कानून में इसकी स्पष्ट व्यवस्था नहीं है, तब तक मृतक के कानूनी वारिसों से टैक्स की वसूली नहीं की जा सकती।हाई कोर्ट की एकलपीठ ने विभाग की ओर से जारी रिकवरी नोटिस को रद्द करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि केवल वारिस होने के आधार पर किसी व्यक्ति को मृतक के टैक्स का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। ये फैसला कई मामलों में उदाहरण बन सकता है।
क्या था पूरा मामला?
दरअसल भिलाई निवासी स्व. महेंद्रन रूपेश नायडू अपने नाम से एक प्रोपराइटरशिप फर्म चलाते थे और सब-कॉन्ट्रैक्टर के रूप में काम करते थे। इसी दौरान सर्विस टैक्स विभाग ने वर्ष 2013-14 के लिए जांच के बाद करीब 10.74 लाख रुपये सर्विस टैक्स और उतनी ही राशि का जुर्माना लगाया। इस आदेश के खिलाफ दायर अपील भी खारिज हो गई।इसी बीच 3 मई 2023 को महेंद्रन रूपेश नायडू का निधन हो गया।इसके बाद दिसंबर 2024 में जीएसटी एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग ने उनकी पत्नी के नाम रिकवरी नोटिस जारी कर बैंक खाते से बकाया राशि वसूलने की प्रक्रिया शुरू कर दी। विभाग लगातार नोटिस भेज रहा था और पैसे जमा करने के लिए दबाब बना रहा था।
पत्नी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया
मृतक की पत्नी देवन अनीषा ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि प्रोपराइटरशिप फर्म और उसके मालिक की अलग-अलग कानूनी पहचान नहीं होती। मालिक की मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिसों से सर्विस टैक्स वसूलने का कोई प्रावधान फाइनेंस एक्ट में नहीं है। इसलिए विभाग की कार्रवाई कानून के खिलाफ है।
विभाग ने क्या कहा?
विभाग का कहना था कि टैक्स की मांग और आदेश व्यक्ति के जीवित रहते ही पारित हो चुके थे। इसलिए बकाया राशि की वसूली उसके कानूनी वारिसों से भी की जा सकती है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि किसी भी कर की वसूली केवल उसी स्थिति में कानूनी वारिसों से की जा सकती है, जब संबंधित कानून में इसका स्पष्ट प्रावधान हो।अदालत ने कहा कि फाइनेंस एक्ट, 1994 में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिसके आधार पर मृतक के वारिसों से सर्विस टैक्स की बकाया राशि वसूली जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के Shabina Abraham vs Collector of Central Excise and Customs मामले का उल्लेख किया। सर्वोच्च अदालत भी पहले स्पष्ट कर चुकी है कि यदि कानून में विशेष प्रावधान नहीं है, तो मृत करदाता की देनदारी उसके कानूनी वारिसों पर स्वतः लागू नहीं होती।
रिकवरी नोटिस रद्द
इन्हीं आधारों पर हाई कोर्ट ने 13 दिसंबर 2024 को जारी रिकवरी और गार्निशी नोटिस को रद्द कर दिया। साथ ही विभाग को निर्देश दिया कि केवल मृतक के कानूनी वारिस होने के आधार पर उनके खिलाफ सर्विस टैक्स की वसूली की कार्रवाई न की जाए।
आसान भाषा में समझिए फैसला
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने अपने नाम से कारोबार किया और उस पर टैक्स बकाया था। यदि उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो केवल उसके बेटे, बेटी या पत्नी होने के कारण उनसे वह टैक्स नहीं वसूला जा सकता। ऐसा तभी संभव होगा, जब संबंधित कानून में साफ तौर पर लिखा हो कि कानूनी वारिस भी उस टैक्स के लिए जिम्मेदार होंगे। इस मामले में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था, इसलिए हाई कोर्ट ने परिवार को राहत दे दी।



















