सूरजपुर। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से एक ऐसी शर्मनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रसव पीड़ा से तड़प रही गर्भवती महिला तक एंबुलेंस तो पहुंची, लेकिन उसके घर तक जाने का रास्ता ही नहीं था। वजह बताई जा रही है कि सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण के कारण वर्षों पुराना रास्ता बंद हो गया था। मजबूरी ऐसी बनी कि महिला का प्रसव खेत में ही कराना पड़ा।
शर्मनाक! लेकिन सरकारी लापरवाही की ये सच्ची तस्वीर प्रतापपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत धुरिया की है, जहां एक ओर सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और मातृ सुरक्षा के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर एक रास्ते की समस्या ने उन दावों की हकीकत उजागर कर दी।
तीन महीने तक दफ्तरों के चक्कर, फिर भी नहीं खुला रास्ता
ग्रामीणों का आरोप है कि घर तक जाने वाला रास्ता सरकारी जमीन पर कथित कब्जे के कारण बंद कर दिया गया है। इसे लेकर प्रभावित परिवार पिछले तीन महीने से नायब तहसीलदार कार्यालय के चक्कर काट रहा था। कई बार शिकायतें और आवेदन देने के बावजूद रास्ता बहाल नहीं कराया गया।अगर समय रहते राजस्व विभाग कार्रवाई करता, तो शायद आज यह नौबत नहीं आती।
एंबुलेंस पहुंची, लेकिन मरीज तक नहीं पहुंच सकी
प्रसव पीड़ा शुरू होने पर परिजनों ने तत्काल एंबुलेंस को सूचना दी। एंबुलेंस गांव तक तो पहुंच गई, लेकिन रास्ता बंद होने के कारण महिला के घर तक नहीं जा सकी। आखिरकार परिजनों को गर्भवती महिला को खेत के रास्ते ले जाना पड़ा, लेकिन दर्द इतना बढ़ चुका था कि बीच खेत में ही प्रसव हो गया।यह केवल एक महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता की कहानी है, जहां एक रास्ता भी समय पर उपलब्ध नहीं कराया जा सका।
स्वास्थ्य नहीं, इस बार सवाल राजस्व विभाग पर
अक्सर ऐसी घटनाओं में स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्थाओं पर सवाल उठते हैं, लेकिन इस मामले में स्थिति अलग है। यहां एंबुलेंस अपनी जिम्मेदारी निभाने पहुंची, लेकिन राजस्व विभाग की कथित निष्क्रियता और रास्ते के विवाद का समाधान न होने से पूरी व्यवस्था बेबस नजर आई।यानी इस बार लापरवाही का आरोप स्वास्थ्य विभाग पर नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र पर है, जो महीनों से रास्ते की समस्या का समाधान नहीं कर पाया।
क्या एक रास्ता भी नहीं दे सकता प्रशासन?
यह घटना कई सवाल छोड़ गई है—
- क्या शिकायतों के बाद भी प्रशासन की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
- क्या सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण हटाना इतना मुश्किल था?
- क्या एक गर्भवती महिला की जान जोखिम में पड़ने के बाद ही कार्रवाई होगी?
- अगर प्रसव के दौरान कोई गंभीर अनहोनी हो जाती, तो जिम्मेदार कौन होता?
ग्रामीणों में भारी आक्रोश
घटना के बाद गांव में प्रशासन के खिलाफ नाराजगी है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर समय रहते रास्ता खुलवा दिया गया होता तो महिला को खेत में प्रसव जैसी अमानवीय स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। अब ग्रामीण जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई और तत्काल रास्ता बहाल करने की मांग कर रहे हैं।
अब प्रशासन की परीक्षा
यह मामला केवल एक प्रसव का नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता की परीक्षा है। सवाल यह है कि क्या इस घटना के बाद जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?



















