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CG High Court: चयन सूची में नाम फिर भी नहीं मिली नौकरी, 2015 का आदेश रद्द; अब दोबारा होगी सुनवाई

CG High Court ने MPHW भर्ती मामले में स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त संचालक का वर्ष 2015 का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर देकर अभ्यावेदन पर नए सिरे से फैसला लेने के निर्देश दिए।

August 9, 2026 6:50 AM
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की फाइल फोटो
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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने नियुक्ति के मामले में बड़ा अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता यानी MPHW भर्ती से जुड़े पुराने मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए सरकार को अहम निर्देश दिये हैं। चयन सूची में जगह बनाने के बावजूद नियुक्ति से वंचित चार अभ्यर्थियों के मामले में कोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त संचालक द्वारा वर्ष 2015 में दिए गए आदेश को निरस्त कर दिया है।

अदालत ने माना कि किसी अभ्यावेदन को खारिज करते समय संबंधित अधिकारी को निर्णय के पीछे के कारण स्पष्ट रूप से बताने चाहिए। हाई कोर्ट ने अब मामले को दोबारा सक्षम अधिकारी के पास भेजते हुए याचिकाकर्ताओं को उचित सुनवाई का अवसर देने का निर्देश दिया है।

2012 की भर्ती में चयन सूची में आया था नाम

मामला वर्ष 2012 में जारी भर्ती विज्ञापन से जुड़ा है। मनीष राजपूत, रविशंकर देवांगन, दिनेश सिंह राजपूत सहित चार अभ्यर्थियों ने बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता (MPHW) के पद के लिए आवेदन किया था।चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन अभ्यर्थियों के नाम चयन सूची में शामिल किए गए, लेकिन इसके बावजूद उन्हें नियुक्ति आदेश जारी नहीं किया गया। नियुक्ति नहीं मिलने पर उन्होंने हाई कोर्ट की शरण ली थी।

पहले खारिज हो चुकी थी याचिका

दरअसल नियुक्ति की मांग को लेकर दायर उनकी प्रारंभिक याचिका हाई कोर्ट से खारिज हो गई थी। इसके बाद अभ्यर्थियों ने रिट अपील दाखिल की।मामले की सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने 30 अक्टूबर 2014 को उन्हें राज्य सरकार के समक्ष अपनी शिकायत और मांग रखने के लिए अभ्यावेदन देने की स्वतंत्रता दी थी। इसके बाद सरकार के निर्देश के अनुसार याचिकाकर्ताओं ने अपना अभ्यावेदन संबंधित विभाग के समक्ष प्रस्तुत किया।

2015 में अभ्यावेदन कर दिया गया था खारिज

याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रस्तुत अभ्यावेदन पर स्वास्थ्य सेवा के संयुक्त संचालक ने 16 सितंबर 2015 को आदेश जारी किया। इस आदेश के माध्यम से उनकी मांग को खारिज कर दिया गया।अभ्यर्थियों ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि उनके अभ्यावेदन को अस्वीकार करने के पीछे स्पष्ट कारण नहीं बताए गए हैं। उनका तर्क था कि किसी व्यक्ति की मांग पर निर्णय लेते समय सक्षम अधिकारी को यह बताना जरूरी है कि उसे स्वीकार या खारिज करने का आधार क्या है।

सरकार ने 14 साल पुराना मामला होने की दी दलील

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया गया। शासन ने अदालत के समक्ष कहा कि मामले को काफी लंबा समय बीत चुका है और लगभग 14 वर्ष गुजर जाने के बाद अब पुराने दावे पर दोबारा विचार करना उचित नहीं होगा। हालांकि, अदालत ने इस आधार पर मामले को समाप्त नहीं किया और 2015 में पारित आदेश की वैधानिकता पर विचार किया।

हाई कोर्ट ने रद्द किया 2015 का आदेश

जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने स्वास्थ्य सेवा के संयुक्त संचालक द्वारा वर्ष 2015 में पारित आदेश को निरस्त कर दिया।कोर्ट ने मामले को संबंधित अधिकारी के पास वापस भेजते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाए। इसके बाद उनके अभ्यावेदन पर नियम और कानून के अनुसार नए सिरे से निर्णय लिया जाए।

अब नए सिरे से होगा मामले पर विचार

हाई कोर्ट के आदेश के बाद चारों याचिकाकर्ताओं के मामले में अब दोबारा विभागीय स्तर पर विचार किया जाएगा। हालांकि, अदालत ने सीधे नियुक्ति देने का आदेश नहीं दिया है।अब सक्षम अधिकारी को पहले याचिकाकर्ताओं की बात सुननी होगी और उपलब्ध रिकॉर्ड तथा लागू नियमों के आधार पर उनके अभ्यावेदन पर नया फैसला लेना होगा। इस तरह वर्षों पुराने MPHW नियुक्ति विवाद में एक बार फिर निर्णय की प्रक्रिया शुरू होगी।

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