बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रभारी पद को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया है कि केवल वरिष्ठता के आधार पर कोई अधिकारी किसी उच्च पद के प्रभार पर कानूनी अधिकार का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि किसी उच्च पद का प्रभार देना सामान्यतः एक अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था होती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक किसी नियम या कानून में यह अनिवार्य नहीं किया गया हो कि उच्च पद का प्रभार वरिष्ठ अधिकारी को ही दिया जाएगा, तब तक केवल वरिष्ठता के आधार पर प्रभार पाने का कोई कानूनी या लागू कराने योग्य अधिकार नहीं बनता। इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने गरियाबंद में प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) की नियुक्ति को लेकर दायर याचिका पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस विभु दत्त गुरु की एकलपीठ ने छुरा (गरियाबंद) के ब्लाक शिक्षा अधिकारी (BEO) किशुन लाल मातवाले की याचिका खारिज कर दी। मातवाले ने राज्य शासन के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत कनिष्ठ प्राचार्य राजेश चंद्राकर को प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी नियुक्त किया गया था।
मातवाले ने हाई कोर्ट में दलील दी थी कि वह वर्ष 1995 से शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं और राजेश चंद्राकर से वरिष्ठ हैं। उनका कहना था कि चंद्राकर को हाल ही में प्राचार्य के पद पर पदोन्नति मिली है। इसके बावजूद उन्हें प्रभारी DEO की जिम्मेदारी देना प्रशासनिक नियमों और वरिष्ठता के सिद्धांत के विपरीत है।
10 जून के आदेश को दी थी चुनौती
याचिकाकर्ता ने राज्य शासन द्वारा 10 जून 2026 को जारी आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत राजेश चंद्राकर को प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी बनाया गया था। मातवाले का तर्क था कि जब वह विभाग में लंबे समय से कार्यरत हैं और वरिष्ठ हैं, तो कनिष्ठ अधिकारी को DEO का प्रभार दिया जाना उचित नहीं है।
वहीं, राज्य शासन की ओर से कोर्ट में बताया गया कि प्रभारी DEO की व्यवस्था अस्थायी प्रकृति की है। शासन ने यह भी बताया कि कलेक्टर की ओर से किशुन लाल मातवाले के खिलाफ गंभीर लापरवाही से संबंधित रिपोर्ट भेजी गई थी। इन्हीं प्रशासनिक परिस्थितियों को देखते हुए प्रभार की व्यवस्था की गई थी।
क्या है पूरा मामला?
स्कूल शिक्षा विभाग ने 10 जून 2026 को एक आदेश जारी कर प्राचार्य राजेश चंद्राकर को गरियाबंद का प्रभारी DEO नियुक्त किया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए गरियाबंद जिले के कुरा ब्लॉक में पदस्थ BEO किशुन लाल मातवाले ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिकाकर्ता का कहना था कि वह वर्ष 1995 से शिक्षा विभाग में सेवा दे रहे हैं और नियुक्त किए गए राजेश चंद्राकर से वरिष्ठ हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा नियम 2026 के तहत वह DEO पद की पात्रता रखते हैं।
याचिकाकर्ता ने वरिष्ठता की अनदेखी का लगाया आरोप
किशुन लाल मातवाले की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि राज्य शासन ने वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए उनसे कनिष्ठ अधिकारी को गरियाबंद DEO का प्रभार सौंप दिया। याचिकाकर्ता ने इसे शासन के निर्देशों के विपरीत बताते हुए विभागीय आदेश को चुनौती दी।
मामले में राज्य शासन की ओर से महाधिवक्ता कार्यालय के विधि अधिकारी ने शासन का पक्ष रखा।
कलेक्टर की रिपोर्ट का भी दिया गया हवाला
राज्य शासन की ओर से सुनवाई के दौरान गरियाबंद कलेक्टर के 6 जून 2026 के एक गोपनीय पत्र का हवाला दिया गया। शासन के अनुसार कलेक्टर ने याचिकाकर्ता के कामकाज में कथित लापरवाही और सरकारी नियमों की अनदेखी का उल्लेख करते हुए उनके खिलाफ निलंबन और विभागीय जांच शुरू करने का प्रस्ताव भेजा था।
हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कलेक्टर की ओर से भेजा गया प्रस्ताव अपने आप में कोई अंतिम अनुशासनात्मक निष्कर्ष नहीं है।
प्रभार देने में प्रशासनिक उपयुक्तता भी जरूरी
जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा कि किसी अधिकारी को उच्च पद का प्रभार देने से पहले उसकी कार्यशैली, प्रशासनिक आवश्यकता, अनुभव और समग्र उपयुक्तता पर विचार किया जा सकता है।
कोर्ट ने माना कि किसी अधिकारी के खिलाफ प्रस्तावित विभागीय कार्रवाई अंतिम निष्कर्ष नहीं है, लेकिन सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधिकारी की उपयुक्तता का आकलन करते समय उपलब्ध तथ्यों पर विचार करना अपने आप में अनुचित नहीं है।
नियमों का उल्लंघन या दुर्भावना साबित नहीं तो कोर्ट नहीं करेगा हस्तक्षेप
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप तभी उचित होगा, जब निर्णय में नियमों का उल्लंघन या दुर्भावना जैसी स्थिति सामने आए। केवल यह आधार कि किसी वरिष्ठ अधिकारी को प्रभार नहीं दिया गया और उसके स्थान पर कनिष्ठ अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई, अपने आप में हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं है।कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद किशुन लाल मातवाले की याचिका खारिज कर दी गई।
फैसले का सीधा मतलब
हाईकोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि प्रभारी पद और नियमित पदोन्नति को एक समान नहीं माना जा सकता। प्रभारी व्यवस्था में प्रशासनिक आवश्यकता और अधिकारी की उपयुक्तता को भी ध्यान में रखा जा सकता है। इसलिए सिर्फ वरिष्ठता के आधार पर प्रभारी पद पाने का दावा अपने आप में कानूनी अधिकार नहीं बन जाता।




















