बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना नोटिस व सुनवाई के प्रमोशन रद्द नहीं किया जा सकता। मामला मुंगेली जिले के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग से जुड़ा है। जहां हाईकोर्ट से स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को राहत दी है।
अदालत ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), मुंगेली द्वारा 4 अक्टूबर 2024 को जारी पदोन्नति निरस्त करने के आदेश को रद्द कर दिया है।न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की एकलपीठ ने स्पष्ट कहा कि बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए और बिना सुनवाई का अवसर दिए किसी भी सरकारी कर्मचारी की पदोन्नति रद्द करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
विभागीय पदोन्नति के 20 दिन बाद रद्द हुआ था आदेश
दरअसल मामले में याचिकाकर्ता ओमकार प्रसाद पांडेय एवं अन्य कर्मचारियों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई। रिकॉर्ड के अनुसार, 10 सितंबर 2024 को विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की अनुशंसा के आधार पर 13 सितंबर 2024 को चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों को सहायक ग्रेड-3 के पद पर पदोन्नत किया गया था।हालांकि, महज 20 दिन बाद, 4 अक्टूबर 2024 को सीएमएचओ ने सभी पदोन्नतियों को निरस्त कर दिया।
96 से घटकर 71 नाम होने पर उठे सवाल
कोर्ट में पेश जानकारी के अनुसार, पदोन्नति प्रक्रिया के दौरान जारी अंतरिम मेरिट सूची में 96 कर्मचारियों के नाम शामिल थे, जबकि अंतिम सूची में केवल 71 नाम रह गए। 25 कर्मचारियों के नाम हटाए जाने को लेकर शिकायतें सामने आईं, जिसके बाद राज्य सरकार ने 24 सितंबर 2024 को एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की।समिति ने अपनी जांच में पदोन्नति प्रक्रिया में विसंगतियों की पुष्टि की, जिसके आधार पर सीएमएचओ ने प्रमोशन निरस्त करने का आदेश जारी कर दिया।
कर्मचारियों ने कोर्ट में दी यह दलील
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि कर्मचारियों को विभागीय पदोन्नति समिति की अनुशंसा के आधार पर विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत पदोन्नति दी गई थी। यदि प्रक्रिया में कोई प्रशासनिक त्रुटि हुई है, तो उसका खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतना चाहिए।उन्होंने यह भी कहा कि बिना नोटिस और बिना पक्ष रखने का अवसर दिए प्रमोशन रद्द करना संविधान और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि प्रशासनिक निर्णय लेते समय नागरिकों और सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों का सम्मान करना आवश्यक है। किसी भी कर्मचारी के हितों को प्रभावित करने वाला आदेश पारित करने से पहले उसे कारण बताओ नोटिस देना और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 4 अक्टूबर 2024 के प्रमोशन निरस्तीकरण आदेश को रद्द कर दिया।
जांच जारी रखने की दी अनुमति
हालांकि, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को यह छूट भी दी है कि यदि पदोन्नति प्रक्रिया में वास्तव में कोई अनियमितता हुई है, तो वह उसकी जांच कर सकती है। लेकिन भविष्य में कोई भी कार्रवाई विधि सम्मत प्रक्रिया, नोटिस और सुनवाई के बाद ही की जा सकेगी।इस फैसले को सरकारी कर्मचारियों के सेवा अधिकारों और प्राकृतिक न्याय (Principles of Natural Justice) के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।










