Teacher News: बिना विभागीय जांच किये ही किसी की बर्खास्तगी नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी के साथ शिक्षिका की बर्खास्तगी रद्द कर दी। दरअसल शिक्षिका 233 दिनों तक स्कूल से अनुपस्थित थी, जिसके बाद सिर्फ एक नोटिस के आधार पर उनकी सेवा समाप्त कर दी गयी। इस मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फैसले में कहा है कि किसी नियमित कर्मचारी को बिना विधिवत विभागीय जांच के सेवा से नहीं हटाया जा सकता।
कोर्ट ने बालोद जिले के डौंडीलोहारा जनपद पंचायत के तत्कालीन सीईओ द्वारा जारी सेवा समाप्ति आदेश को असंवैधानिक और कानून के विरुद्ध बताते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही शिक्षिका की सेवा बहाल करने का निर्देश दिया, हालांकि बकाया वेतन (Back Wages) को लेकर फिलहाल कोई आदेश नहीं दिया गया।
2005 में हुई नियुक्ति, 2009 में हुई थीं नियमित
ये पूरा मामला बालोद जिले के अर्जुन्दा निवासी कुमारी तस्लीम बानो से जुड़ा है। उनकी नियुक्ति 9 जून 2005 को डौंडीलोहारा विकासखंड के शासकीय प्राथमिक शाला शिकारीटोला में सहायक शिक्षक पंचायत (शिक्षाकर्मी ग्रेड-3) के रूप में हुई थी। बाद में 13 अगस्त 2009 को उनकी सेवाएं नियमित कर दी गई थीं। वो अपनी शासकीय जिम्मेदारी को निभा रही थी।
233 दिनों की अनुपस्थिति के आधार पर हुई थी कार्रवाई
रिकॉर्ड के अनुसार, नियमितीकरण के बाद शिक्षिका विभिन्न अवधियों में करीब 233 दिनों तक अनुपस्थित रहीं। इसे आधार बनाते हुए तत्कालीन जनपद पंचायत सीईओ ने कारण बताओ नोटिस जारी किया। नोटिस की प्रक्रिया के बाद 24 अगस्त 2021 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं। जबकि छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (अनुशासन तथा अपील) नियम, 1999के नियमों के खिलाफ ये कार्रवाई गलत थी।
हाईकोर्ट में दी चुनौती
सेवा समाप्ति आदेश को चुनौती देते हुए शिक्षिका ने वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी और अधिवक्ता जैनब वनाक ने दलील दी कि वर्ष 2009 में सेवाएं नियमित होने के बाद उन्हें हटाने से पहले छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (अनुशासन तथा अपील) नियम, 1999 के तहत विभागीय जांच कराना अनिवार्य था।उन्होंने तर्क दिया कि बिना आरोप पत्र जारी किए और बिना विधिवत जांच पूरी किए सेवा समाप्ति का आदेश पूरी तरह अवैध है।
जनपद पंचायत ने क्या कहा?
जनपद पंचायत की ओर से अधिवक्ता कात्यायनी विष्णुप्रिया ने अदालत को बताया कि शिक्षिका लंबे समय तक बिना अनुमति अनुपस्थित रहीं। कई बार नोटिस जारी करने के बावजूद उन्होंने ड्यूटी ज्वाइन नहीं की, इसलिए नियमानुसार उनकी सेवाएं समाप्त की गईं।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे ने कहा कि 1997 के नियम केवल अस्थायी कर्मचारियों पर लागू होते हैं, जबकि याचिकाकर्ता वर्ष 2009 से नियमित कर्मचारी थीं। इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (अनुशासन तथा अपील) नियम, 1999 के तहत ही की जानी चाहिए थी।
अदालत ने पाया कि विभाग ने न तो औपचारिक आरोप पत्र जारी किया और न ही विधिसम्मत विभागीय जांच कराई। ऐसे में 24 अगस्त 2021 का सेवा समाप्ति आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और वैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।
सेवा बहाल करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने सेवा समाप्ति आदेश को निरस्त करते हुए शिक्षिका की सेवा बहाल करने का निर्देश दिया। हालांकि, सेवा समाप्ति से लेकर बहाली तक की अवधि के बकाया वेतन को लेकर फिलहाल कोई आदेश पारित नहीं किया गया है।










