बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ 15 साल बाद शुरू की गई विभागीय कार्रवाई पर कड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने इसे मनमाना और अनुचित ठहराते हुए उसे निरस्त कर दिया है। अदालत ने विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए पूछा कि जब संबंधित अधिकारी ने वर्ष 2008 में ही सभी आवश्यक जानकारी विभाग को दे दी थी, तो फिर कार्रवाई शुरू करने में 15 साल की देरी क्यों हुई।यह फैसला पुलिस अधिकारी इरफान उल रहीम खान की ओर से दायर याचिका पर सुनाया गया, जिसमें उन्होंने विभागीय कार्रवाई को चुनौती दी थी।
क्या है पूरा मामला?
मामला पुलिस अधिकारी की दूसरी शादी से जुड़ा है। विभाग का आरोप था कि उन्होंने दूसरी शादी करने से पहले विभागीय अनुमति नहीं ली, जिसके आधार पर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। हालांकि, याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उन्होंने वर्ष 2008 में ही दूसरी शादी की जानकारी विभाग को दे दी थी और विधिवत अनुमति के लिए आवेदन भी प्रस्तुत किया था।
15 साल तक विभाग ने नहीं लिया कोई फैसला
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि अधिकारी के आवेदन पर सरकार ने वर्षों तक कोई निर्णय नहीं लिया। इसके बाद अचानक वर्ष 2023 में विभाग ने उसी मामले में चार्जशीट जारी कर विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी।हाई कोर्ट ने इस देरी को गंभीर प्रशासनिक लापरवाही मानते हुए कहा कि इतने लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के बाद कार्रवाई शुरू करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि मामला इतना गंभीर था तो विभाग 15 वर्षों तक क्यों सोता रहा?कोर्ट ने माना कि जब अधिकारी ने समय पर सूचना और अनुमति के लिए आवेदन दे दिया था, तब विभाग का वर्षों तक कोई निर्णय न लेना और बाद में कार्रवाई करना मनमाना प्रशासनिक रवैया दर्शाता है।
पुलिस अधिकारी को मिली बड़ी राहत
हाई कोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को निरस्त करते हुए याचिका स्वीकार कर ली। इस फैसले के साथ पुलिस अधिकारी इरफान उल रहीम खान को बड़ी कानूनी राहत मिली है।अदालत के इस निर्णय को प्रशासनिक मामलों में अनावश्यक देरी और विलंब से की जाने वाली विभागीय कार्रवाई पर महत्वपूर्ण टिप्पणी माना जा रहा है।



















