बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक अहम मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी या बहन को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह के बाद बेटी का अपने मायके से संबंध खत्म नहीं हो जाता और यदि वह मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार पर निर्भर है या पात्रता की अन्य शर्तें पूरी करती है, तो उसे केवल वैवाहिक स्थिति के कारण अपात्र नहीं ठहराया जा सकता।
क्या था पूरा मामला?
हाईकोर्ट के इस फैसले को अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। बिलासपुर निवासी तारा मिश्रा ने अपने बेटे दुर्गेश मिश्रा की मृत्यु के बाद अपनी बेटी अमिता दुबे के लिए अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी। दुर्गेश मिश्रा जिला लोक अभियोजन अधिकारी कार्यालय में कार्यरत थे और 13 जून 2018 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया था।
जब आवेदन पर कार्रवाई नहीं हुई तो परिवार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत के निर्देश के बाद भी शासन ने 19 सितंबर 2019 को आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वर्ष 2013 की नीति में शादीशुदा बहन को अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान नहीं है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने शासन के इस आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के आश्रित परिवार को आर्थिक सहारा देना है, इसलिए केवल विवाह को अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता।अदालत ने कहा कि बेटी की शादी हो जाने से यह नहीं माना जा सकता कि उसका अपने मायके से संबंध या जिम्मेदारियां पूरी तरह समाप्त हो गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और सायरा खातून बनाम बिहार राज्य मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि वैवाहिक स्थिति और आश्रित होने का सीधा संबंध नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि यदि शादीशुदा बेटे को परिवार का सदस्य माना जाता है, लेकिन शादीशुदा बेटी को केवल विवाह के आधार पर बाहर कर दिया जाता है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(1) के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन और लैंगिक भेदभाव होगा।
‘बहन’ में शादीशुदा बहन भी शामिल
अदालत ने वर्ष 2013 की अनुकंपा नियुक्ति नीति का विश्लेषण करते हुए कहा कि उसमें “भाई या बहन” शब्द का इस्तेमाल किया गया है। नीति में कहीं भी यह नहीं लिखा गया कि शादीशुदा बहन इस श्रेणी से बाहर होगी।इसलिए केवल विवाहित होने के आधार पर अमिता दुबे का आवेदन खारिज करना कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
चार सप्ताह में नया फैसला लेने के निर्देश
हाईकोर्ट ने शासन का 19 सितंबर 2019 का आदेश निरस्त करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं के मामले पर चार सप्ताह के भीतर नए सिरे से विचार कर कानून के अनुरूप निर्णय लें।
इस फैसले के बाद भविष्य में ऐसे मामलों में विवाहित बेटी या बहन के आवेदन को केवल शादी के आधार पर खारिज करना आसान नहीं होगा। अब संबंधित विभागों को परिवार की वास्तविक स्थिति और सरकारी नीति के अन्य प्रावधानों को ध्यान में रखकर फैसला लेना होगा।



















