रायपुर। छत्तीसगढ़ में शिक्षकों के लंबे समय से प्रतीक्षित तबादले की सूची आखिरकार जारी हो गई है। करीब 600-700 शिक्षकों के तबादले वाली इस सूची के सामने आने के बाद अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसका तबादला कहां हुआ? बड़ा सवाल यह है कि तबादले के बाद पदस्थापना का अधिकार आखिर किस आधार पर और किसके हाथ में छोड़ा गया है?
कहां जाएंगे तबादला पाने वाले शिक्षक? स्कूल का नाम तय नहीं
तबादला सूची को गौर से देखने पर पता चलता है कि करीब 20 अलग-अलग तबादला आदेशों को क्लब कर एक संयुक्त ट्रांसफर PDF जारी की गई है। इन आदेशों में बड़ी संख्या में शिक्षकों की नई पदस्थापना “जिला शिक्षा अधिकारी के विकल्प पर” छोड़ी गई है। सवाल यह है कि जब स्कूल शिक्षा विभाग के पोर्टल पर स्वीकृत और रिक्त पदों की जानकारी उपलब्ध है, तो फिर शिक्षकों की पदस्थापना का विकल्प DEO के विवेक पर छोड़ने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
600 से ज्यादा शिक्षकों की पोस्टिंग का फैसला DEO के भरोसे क्यों?
तबादला सूची में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यही है कि बड़ी संख्या में शिक्षकों को स्थानांतरित तो कर दिया गया, लेकिन उनकी नई पदस्थापना स्पष्ट रूप से किसी स्कूल में नहीं की गई। इसके बजाय आदेश में DEO के विकल्प पर पदस्थापना का उल्लेख कर दिया गया।
अब सवाल सीधा है—जब विभाग को पता है कि किस जिले में कौन सा पद रिक्त है, किस स्कूल में शिक्षक की कमी है और कहां स्वीकृत पद उपलब्ध हैं, तो फिर शिक्षक को स्कूल आवंटित करने का काम DEO के विवेक पर क्यों छोड़ा गया?
क्या विभाग के पास तबादला करने से पहले रिक्त और स्वीकृत पदों का मिलान करने का समय नहीं था? अगर यह जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध है तो फिर पदस्थापना के लिए इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों को DEO के विकल्प पर रखने की जरूरत क्यों पड़ी?
एक सूची में 20 में से 18 शिक्षक DEO के विकल्प पर
तबादला सूची की शुरुआती दो सूचियों को ही देखें तो तस्वीर काफी कुछ कहती है। पहली सूची में 20 नामों में से 18 शिक्षकों की पदस्थापना DEO के विकल्प पर छोड़ी गई है। दूसरी सूची में 28 नामों में से करीब 25 शिक्षकों की पोस्टिंग DEO के विकल्प पर है।
यानी सवाल सिर्फ संख्या का नहीं, पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता का है।
600 से ज्यादा नाम, लेकिन स्कूल का पता DEO के हाथ में!
अगर 20 में से 18 और 28 में से 25 शिक्षकों की पोस्टिंग किसी निर्धारित स्कूल में नहीं की गई, तो क्या विभाग यह बताएगा कि आखिर इन शिक्षकों को किस आधार पर स्थानांतरित किया गया? क्या संबंधित जिलों में उनके विषय और पद के अनुसार रिक्तियां उपलब्ध थीं? अगर थीं, तो स्कूल का नाम आदेश में क्यों नहीं दिया गया?
DEO के विकल्प का आधार क्या है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि “DEO के विकल्प” की स्पष्ट परिभाषा क्या है?
क्या DEO को मनचाहे स्कूल में शिक्षक की पदस्थापना करने का अधिकार है? क्या इसके लिए कोई लिखित मापदंड है? क्या पहले एकल शिक्षकीय स्कूलों की सूची देखी जाएगी? क्या शिक्षक विहीन स्कूलों को प्राथमिकता दी जाएगी? क्या ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के स्कूलों को प्राथमिकता मिलेगी?
DEO के विकल्प से खुलेगा Posting में ‘डील’ का रास्ता?
तबादला आदेश में यदि यह स्पष्ट कर दिया जाता कि DEO के विकल्प पर रखे गए शिक्षकों को शिक्षक विहीन या एकल शिक्षकीय स्कूलों में काउंसिलिंग के माध्यम से पदस्थ किया जाएगा, तो प्रक्रिया पर सवाल कुछ हद तक कम होते।
लेकिन जब कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश सामने नहीं है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अब पोस्टिंग का असली खेल तबादले के बाद शुरू होगा?
क्या तबादले के बाद फिर शुरू होगी पोस्टिंग की दौड़?
शिक्षक पहले तबादले के लिए परेशान थे। अब तबादला हो गया तो बड़ी संख्या में शिक्षकों के सामने अगला सवाल है—पोस्टिंग कहां मिलेगी?
अगर DEO के विकल्प पर पोस्टिंग होनी है, तो शिक्षक स्वाभाविक रूप से अपनी पसंद के स्कूल में पदस्थापना पाने की कोशिश करेंगे। ऐसे में क्या विभाग ने कोई पारदर्शी प्रक्रिया तय की है?
क्या सभी शिक्षकों को रिक्त पदों की सूची सार्वजनिक कर विकल्प देने का मौका मिलेगा? क्या मेरिट, वरिष्ठता, विषय की आवश्यकता और स्कूल की स्थिति को आधार बनाया जाएगा? या फिर पूरी प्रक्रिया सिर्फ अधिकारी के विवेक पर निर्भर रहेगी?
यही वह बिंदु है जहां भ्रष्टाचार की आशंका को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी अधिकारी या व्यक्ति पर भ्रष्टाचार का आरोप बिना प्रमाण के नहीं लगाया जा सकता। लेकिन व्यवस्था में यदि पारदर्शी मापदंड नहीं होंगे, तो संदेह और शिकायतों की गुंजाइश जरूर बढ़ेगी।
विभागीय अधिकारी ने बताया क्या है नियम?
इस पूरे मामले को लेकर News Post Hindi ने शिक्षा विभाग के एक उच्चाधिकारी से संपर्क किया। अधिकारी के मुताबिक, DEO के विकल्प पर पदस्थापना की व्यवस्था विभाग में मौजूद है। ऐसी स्थिति में जहां रिक्त और स्वीकृत पदों को लेकर अस्पष्टता हो, किसी स्कूल में एक से अधिक विकल्प उपलब्ध हों या किसी शिक्षक की विशेष परिस्थिति अथवा शारीरिक समस्या हो, वहां DEO को शैक्षिक हित को ध्यान में रखते हुए पदस्थापना करने का अधिकार दिया जाता है।
लेकिन यहां फिर सवाल उठता है—क्या 600 से ज्यादा शिक्षकों के मामले में ऐसी परिस्थितियां एक साथ पैदा हो गईं?
क्या इतनी बड़ी संख्या में स्कूलों में रिक्त पदों की स्थिति स्पष्ट नहीं थी? अगर नहीं थी तो तबादला आदेश जारी करने से पहले इसका समाधान क्यों नहीं किया गया?
अधिकारी बोले- पारदर्शिता की उम्मीद है
एक अन्य अधिकारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि इतनी बड़ी संख्या में तबादला सूची में DEO के विकल्प पर पदस्थापना का मामला सामान्य नहीं है। उनसे जब पूछा गया कि क्या इससे भ्रष्टाचार की संभावना नहीं बढ़ेगी, तो उनका कहना था कि नियम के मुताबिक संबंधित अधिकारी को पोस्टिंग से पहले विभाग से मार्गदर्शन लेना चाहिए।
अधिकारी ने यह भी कहा कि यदि DEO अपने विवेक से पदस्थापना करते हैं तो उनसे शैक्षणिक हित और पारदर्शिता का ध्यान रखने की उम्मीद की जाती है।
लेकिन यहां फिर वही सवाल है—क्या सिर्फ उम्मीद के भरोसे इतनी बड़ी प्रशासनिक प्रक्रिया छोड़ी जा सकती है?
कहीं ग्रामीण स्कूल फिर न हो जाएं खाली
सबसे बड़ी चिंता ग्रामीण और दूरस्थ स्कूलों को लेकर है। यदि DEO को बिना स्पष्ट मापदंड के पदस्थापना का अधिकार दिया गया तो आशंका है कि शिक्षक अपनी सुविधा के अनुसार शहरी या सुविधाजनक स्कूलों में पदस्थापना कराने का प्रयास कर सकते हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि जिस तबादला प्रक्रिया का उद्देश्य
प्रशासनिक संतुलन और शिक्षकों की सुविधा था, कहीं वही प्रक्रिया ग्रामीण स्कूलों के लिए नई समस्या तो नहीं बन जाएगी?
क्यों न DEO के विकल्प पर रखे गए सभी शिक्षकों की काउंसिलिंग कराई जाए? क्यों न पहले शिक्षक विहीन और एकल शिक्षकीय स्कूलों की सूची जारी की जाए? क्यों न शिक्षकों को पारदर्शी तरीके से विकल्प दिए जाएं और पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन की जाए?
असली परीक्षा अब तबादले की नहीं, पोस्टिंग की
तबादला सूची जारी हो चुकी है। अब असली परीक्षा विभाग की पोस्टिंग प्रक्रिया की है।
विभाग यदि स्पष्ट कर दे कि DEO के विकल्प पर रखे गए शिक्षकों की पदस्थापना रिक्त पद, विषय की आवश्यकता, शिक्षक विहीन स्कूल, एकल शिक्षकीय स्कूल, वरिष्ठता और पारदर्शी काउंसिलिंग के आधार पर होगी, तो विवाद की गुंजाइश काफी कम हो सकती है।
लेकिन यदि पोस्टिंग का पूरा अधिकार सिर्फ अधिकारी के विवेक पर छोड़ दिया गया, तो सवाल उठते रहेंगे।
- आखिर जब विभाग के पास ऑनलाइन डेटा मौजूद है, तो फिर स्कूल का नाम तय करने में इतनी अस्पष्टता क्यों?
- क्या तबादला सूची जारी करने से पहले रिक्त पदों का मिलान नहीं किया जा सकता था?
- क्या 600-700 शिक्षकों की पोस्टिंग का आधार सार्वजनिक किया जाएगा?
- क्या DEO के विकल्प पर पोस्टिंग के लिए लिखित गाइडलाइन जारी होगी?
और सबसे अहम सवाल—क्या विभाग यह सुनिश्चित करेगा कि पोस्टिंग पारदर्शी तरीके से हो और शिक्षक विहीन तथा एकल शिक्षकीय स्कूलों को प्राथमिकता मिले?इन सवालों के जवाब अब शिक्षा विभाग और संबंधित DEO की अगली कार्रवाई से ही मिलेंगे।
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