बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षकों के स्थानांतरण और युक्तियुक्तकरण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि शिक्षकों का ट्रांसफर और युक्तियुक्तकरण प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। जनहित और प्रशासनिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा किए गए स्थानांतरण में अदालत सामान्य तौर पर हस्तक्षेप नहीं करेगी। न्यायालय ने कहा कि हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है, जब आदेश में स्पष्ट रूप से किसी वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन या दुर्भावना साबित हो।
यह फैसला रायपुर जिले के धरसींवा ब्लॉक के शासकीय प्राथमिक स्कूल बनरासी में पदस्थ शिक्षक सुजीत कुमार शर्मा की याचिका पर सुनाया गया। मामले की सुनवाई जस्टिस बी.डी. गुरु की एकल पीठ में हुई।
युक्तियुक्तकरण के तहत शिक्षक का किया गया था ट्रांसफर
मामले के अनुसार, स्कूल शिक्षा विभाग और जिला शिक्षा अधिकारी की ओर से जून 2025 और जून 2026 में जारी आदेशों के तहत शिक्षक सुजीत कुमार शर्मा को उनके स्कूल में ‘अतिशेष’ यानी Surplus बताया गया था। इसके बाद उन्हें शासकीय प्राथमिक स्कूल कुरा में स्थानांतरित कर दिया गया।
शिक्षक ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए दावा किया कि उनका स्थानांतरण राज्य सरकार की युक्तियुक्तकरण नीति के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि बिना पर्याप्त आधार के किए गए स्थानांतरण के कारण उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
सरकार ने कहा- ट्रांसफर प्रशासनिक अधिकार का हिस्सा
सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से पैनल लॉयर अपूर्वा निगम ने शासन का पक्ष रखा। उन्होंने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के 18 सितंबर 2025 के पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षक युक्तियुक्तकरण से जुड़े निर्देश मुख्य रूप से Guidelines यानी मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।
शासन की ओर से दलील दी गई कि ऐसी गाइडलाइन नियोक्ता के सामान्य प्रशासनिक अधिकारों को समाप्त नहीं करती। प्रशासनिक आवश्यकता और लोकहित को ध्यान में रखते हुए सरकार को कर्मचारियों की पदस्थापना और स्थानांतरण का अधिकार है।
सरकार ने यह भी कहा कि स्थानांतरण कर्मचारी की सेवा का अभिन्न हिस्सा है और केवल नीतिगत आधार पर किसी ट्रांसफर आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती, जब तक कि उसमें कानून का स्पष्ट उल्लंघन सामने न आए।
हाईकोर्ट ने कहा- कब हो सकता है ट्रांसफर में हस्तक्षेप?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने स्थानांतरण मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा को स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक आवश्यकता के तहत जारी किए गए ट्रांसफर आदेश में अदालत तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगी, जब तक यह साबित न हो जाए कि—
- आदेश जारी करने वाले अधिकारी के पास अधिकार क्षेत्र नहीं था।
- किसी वैधानिक प्रावधान का स्पष्ट उल्लंघन हुआ है।
- स्थानांतरण आदेश दुर्भावना यानी Mala fide से जारी किया गया है।
कोर्ट ने माना कि प्रशासनिक जरूरतों के आधार पर शिक्षकों का युक्तियुक्तकरण करना विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है।
शिक्षक की याचिका खारिज
हाईकोर्ट ने मामले में प्रस्तुत तथ्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद शिक्षक की याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।
इस फैसले से यह संकेत मिलता है कि केवल युक्तियुक्तकरण की गाइडलाइन का हवाला देकर शिक्षकों के प्रशासनिक स्थानांतरण को चुनौती देना पर्याप्त नहीं होगा। ट्रांसफर आदेश में वैधानिक उल्लंघन या दुर्भावना जैसे ठोस आधार साबित करना जरूरी होगा।
शिक्षकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
छत्तीसगढ़ में शिक्षकों के स्थानांतरण और युक्तियुक्तकरण को लेकर लगातार विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे में हाईकोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक आवश्यकताओं के आधार पर होने वाले ट्रांसफर को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, किसी विशेष मामले में यदि स्थानांतरण आदेश कानून के विपरीत या दुर्भावना से प्रेरित पाया जाता है, तो न्यायिक समीक्षा का रास्ता खुला रहेगा।


















