Bilaspur Snakebite Compensation Scam। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए सिम्स पुलिस चौकी के दो पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार पुलिसकर्मियों की पहचान रामकुमार पाटनवार और रामेश्वर भास्कर के रूप में हुई है। दोनों पर फर्जी सर्पदंश मृत्यु प्रकरण तैयार कर सरकारी मुआवजा दिलाने वाले गिरोह का हिस्सा होने का आरोप है।पिछले 48 घंटे में इस मामले में कार्रवाई तेज हुई है। शनिवार से सोमवार के बीच चार बड़ी गिरफ्तारियों के बाद अब दो पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी से साफ हो गया है कि घोटाले का नेटवर्क कई सरकारी विभागों तक फैला हुआ था।
डॉक्टर, बाबू और अब पुलिसकर्मी भी गिरफ्त में
आपको बता दें कि इससे पहले शनिवार को सिम्स की एक महिला डॉक्टर को गिरफ्तार करने की खबर आयी थी। हालांकि बताया ये गया कि ये गिरफ्तारी दो दिन पहले हो चुकी थी। वहीं एक वकील, एसडीएम कार्यालय और तहसील कार्यालय के कर्मचारियों सहित कई आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। जांच में सामने आया है कि फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार कर सर्पदंश से मौत का मामला बनाया जाता था, जिसके आधार पर सरकारी सहायता राशि स्वीकृत कराई जाती थी।महिला डॉक्टर से पूछताछ में मिली महत्वपूर्ण जानकारियों के बाद जांच का दायरा और बढ़ा है। पुलिस का कहना है कि आने वाले दिनों में और भी गिरफ्तारियां हो सकती हैं।
फांसी से हुई मौत को बना दिया सर्पदंश
सरकंडा थाना प्रभारी प्रदीप आर्य के अनुसार, एक व्यक्ति ने फांसी लगाकर आत्महत्या की थी। उस समय पुलिस ने मर्ग कायम कर पोस्टमार्टम कराया था।आरोप है कि बाद में उसी मर्ग नंबर का दुरुपयोग कर फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार की गई। इसके बाद तहसील कार्यालय के बाबू हरिशंकर राठौर, एसडीएम कार्यालय के बाबू नरेंद्र कौशिक और गरीब बिंझवार की मदद से सर्पदंश से मौत का फर्जी प्रकरण बनाकर कलेक्टोरेट में प्रस्तुत किया गया और सरकारी सहायता राशि निकाल ली गई। हालांकिये प्रकरण अभी सिर्फ बिलासपुर में ही सामने आया है, अन्य जगहों पर जांच में और भी खुलासे हो सकते हैं।
अब तक 15 फर्जी मामलों का खुलासा
कलेक्टर को शिकायत मिलने के बाद जिले में सर्पदंश से मौत के मामलों की जांच कराई गई। जांच में 15 संदिग्ध प्रकरण सामने आए, जिसके बाद अलग-अलग थानों में एफआईआर दर्ज की गई।पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि कई मामलों में सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों में हेराफेरी कर फर्जी मुआवजा स्वीकृत कराया गया। हालांकि ये आंकड़ा अभी और बढ़ सकता है।
नाम-पता और मर्ग नंबर भी निकले फर्जी
जांच में यह भी सामने आया कि जिस मर्ग नंबर के आधार पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार की गई थी, वह वास्तव में आत्महत्या के पुराने मामले का था, जिसकी जांच पहले ही पूरी होकर बंद की जा चुकी थी।इतना ही नहीं, जिस व्यक्ति के नाम पर सर्पदंश से मौत दिखाकर सरकारी सहायता राशि निकाली गई, उसका नाम और पता भी फर्जी पाया गया। पुलिस को यह भी आशंका है कि कुछ मामलों में जिंदा लोगों के नाम पर भी मुआवजा निकाला गया, हालांकि इसकी दस्तावेजी पुष्टि अभी बाकी है। लेकिन जिस तरह से मामले उजागर हो रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि अन्य जगहों पर भी जांच की आंच पहुंच सकती है।
सदन तक पहुंचा था मामला
यह मामला छत्तीसगढ़ विधानसभा में भी गूंज चुका है। भाजपा विधायक सुशांत शुक्ला ने इस घोटाले को सदन में उठाया था, जिसके बाद जांच में तेजी आई।अब तक डॉक्टर, वकील, लिपिक, एसडीएम और तहसील कार्यालय के कर्मचारियों के साथ-साथ दो पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। पुलिस का मानना है कि जांच आगे बढ़ने पर इस घोटाले में शामिल अन्य लोगों और संभावित अधिकारियों की भूमिका भी सामने आ सकती है।










