Shakuntala Singh Porte Caste Certificate Case । प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र की विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते की विधायकी रहेगी या जायेगी? जाति प्रमाण पत्र के विवादों में घिरी विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते को लेकर उठे सवाल का जवाब अब छानबीन समिति को देना है। बताया जा रहा है कि जाति प्रमाण पत्र विवाद को लेकर चल रही जांच का सबसे अहम चरण पूरा हो गया है।
मिली जानकारी के मुताबिक जिला स्तरीय जाति प्रमाण पत्र छानबीन समिति के समक्ष दोनों पक्षों की सुनवाई पूरी हो चुकी है और समिति ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या समिति विधायक के जाति प्रमाण पत्र को वैध मानती है या उसे निरस्त करती है? इस फैसले का सीधा असर विधायक के राजनीतिक भविष्य और विधानसभा सदस्यता पर पड़ सकता है।
विधायक पक्ष ने पेश किए मूल दस्तावेज
सुनवाई के दौरान विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते की ओर से उनके अधिवक्ताओं ने समिति के समक्ष अपना पक्ष रखा। उन्होंने जाति प्रमाण पत्र की वैधता साबित करने के लिए मूल दस्तावेज प्रस्तुत किए और दावा किया कि विधायक का जाति प्रमाण पत्र पूरी तरह वैध है तथा सभी आवश्यक दस्तावेज नियमों के अनुरूप हैं।दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद समिति ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
आखिर पूरा विवाद क्या है?
दरअसल, इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब जय श्री पुशाम ने विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते के जाति प्रमाण पत्र को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में आरोप लगाया गया कि विधायक का जाति प्रमाण पत्र उनके पिता के मूल जातीय दस्तावेजों के आधार पर जारी नहीं किया गया।याचिकाकर्ता का यह भी आरोप है कि न तो विधायक और न ही उनके पति के मूल जातीय दस्तावेजों के आधार पर प्रमाण पत्र जारी किया गया, फिर भी उन्हें अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र दे दिया गया।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुई जांच
मामले पर सुनवाई करते हुए 17 जून 2025 को बिलासपुर हाईकोर्ट ने जिला स्तरीय और उच्च स्तरीय जाति प्रमाण पत्र छानबीन समितियों को नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद जिला स्तरीय समिति ने 28 अगस्त, 15 सितंबर और 29 सितंबर 2025 को विधायक को नोटिस जारी कर संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए कहा। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि सुनवाई की कई तारीखों पर विधायक स्वयं उपस्थित नहीं हुईं, जिसे समाज के प्रतिनिधियों ने जांच प्रक्रिया से बचने का प्रयास बताया है।
आदिवासी समाज ने लगाए गंभीर आरोप
आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों का आरोप है कि यदि गलत तरीके से जारी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट से चुनाव लड़ा गया है, तो इससे वास्तविक आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकार प्रभावित हुए हैं। समाज ने इसे गंभीर मामला बताते हुए निष्पक्ष जांच और कानूनी कार्रवाई की मांग की है।हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निर्णय छानबीन समिति के आदेश के बाद ही स्पष्ट होगा।
फैसले पर टिकी हैं राजनीतिक नजरें
अब चूंकि सुनवाई पूरी हो चुकी है और फैसला सुरक्षित है, इसलिए पूरे मामले पर राजनीतिक दलों, आदिवासी समाज और क्षेत्र की जनता की नजरें टिकी हुई हैं। यदि समिति जाति प्रमाण पत्र को वैध मानती है तो विवाद समाप्त हो सकता है, लेकिन यदि प्रमाण पत्र को निरस्त करने का निर्णय लिया जाता है, तो इसके कानूनी और राजनीतिक परिणाम सामने आ सकते हैं। ऐसे किसी भी संभावित परिणाम का निर्धारण संबंधित कानूनी प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकरण के निर्णय के अनुसार होगा।फिलहाल सभी को जिला स्तरीय छानबीन समिति के अंतिम फैसले का इंतजार है।










