High court News बिलासपुर कोर्ट ने अविवाहित मृतक के SBI खाते में जमा 47.83 लाख रुपये के लिए छोटे भाई के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र जारी करने का आदेश दिया। खाते में नॉमिनी नहीं था।
बिलासपुर। अविवाहित व्यक्ति की मौत के बाद उसके बैंक खाते में जमा लाखों रुपये का क्या होगा, जब खाते में कोई नॉमिनी भी दर्ज न हो? बिलासपुर की अदालत के सामने आए एक मामले में इसका रास्ता साफ हो गया है। बैंक खातों में बिना नॉमिनी की जमा राशि पर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। एसबीआई खाते में वर्तमान में 47,83,908.62 रुपये जमा होने की जानकारी सामने आने के बाद अदालत ने मृतक के छोटे भाई के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र जारी करने का आदेश दिया है।मामले में अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों, आवेदक के बयान और बैंक की ओर से पेश रिकॉर्ड का परीक्षण किया। सार्वजनिक सूचना के बावजूद किसी अन्य व्यक्ति की ओर से राशि पर दावा या आपत्ति नहीं की गई।
बड़े भाई की पूरी जिंदगी अविवाहित रही, माता-पिता भी नहीं थे
दरअसल ये पूरा मामला मिलिंद डी. भिड़े द्वारा प्रस्तुत उत्तराधिकार आवेदन से जुड़ा है। आवेदक ने अदालत को बताया कि मृतक विलास दिगंबर भिंडे उनके सगे बड़े भाई थे और उन्होंने जीवनभर विवाह नहीं किया था।दस्तावेजों के मुताबिक विलास भिंडे की मृत्यु 31 मई 2024 को बिलासपुर के हेमूनगर में हुई थी। उनके पिता दिगंबर वामन भिंडे का निधन 11 अप्रैल 1961 और माता पुष्पजा भिंडे का निधन 2 जून 1993 को हो चुका था।आवेदक का कहना था कि इन परिस्थितियों में उसके अलावा मृतक का कोई अन्य कानूनी वारिस नहीं है।
खाते में नहीं था कोई नॉमिनी
मृतक का बचत खाता भारतीय स्टेट बैंक की तितली चौक, रेलवे कॉलोनी, बिलासपुर शाखा में था। आवेदन के समय खाते में 45,17,036 रुपये जमा होने की जानकारी दी गई थी।मामले की सुनवाई के दौरान बैंक ने खाते की वर्तमान स्थिति अदालत के सामने रखी। शाखा प्रबंधक आशीष कुमार गौतम ने शपथपत्र और संबंधित दस्तावेज पेश करते हुए बताया कि खाते में अब 47,83,908.62 रुपये जमा हैं।बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत से उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र प्रस्तुत किए जाने के बाद नियमानुसार राशि का भुगतान किया जा सकता है।
मृत्यु प्रमाण-पत्र से लेकर बैंक दस्तावेज तक हुए पेश
आवेदक की ओर से मृतक से संबंधित कई दस्तावेज अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए गए। इनमें मृत्यु प्रमाण-पत्र, बैंक पासबुक सहित अन्य दस्तावेज शामिल थे। आवेदक ने अपनी पहचान के लिए भी आवश्यक दस्तावेज पेश किए।अदालत ने इन रिकॉर्ड और मामले में उपलब्ध अन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया।
अखबार में सार्वजनिक सूचना, फिर भी कोई दावा नहीं
मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी रहा कि संभावित अन्य दावेदारों को सामने आने का अवसर देने के लिए समाचार पत्र में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित कराई गई थी।इसके बाद भी कोई अन्य व्यक्ति अदालत में उपस्थित होकर खाते में जमा रकम पर अपना अधिकार जताने या आपत्ति दर्ज कराने नहीं आया।इस स्थिति ने मामले में आवेदक के दावे को और महत्वपूर्ण बना दिया।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत अदालत ने माना अधिकारी
अदालत ने रिकॉर्ड और आवेदक के बयान के आधार पर पाया कि मृतक अविवाहित था और उसके माता-पिता का पहले ही निधन हो चुका था। इसके अलावा सार्वजनिक सूचना के बाद भी किसी अन्य व्यक्ति ने उत्तराधिकार को लेकर दावा पेश नहीं किया।अदालत ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए आवेदक को उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र प्राप्त करने का अधिकारी माना।
47.83 लाख रुपये की राशि पर अब आगे क्या होगा?
अदालत ने आवेदन स्वीकार करते हुए कहा कि नियमानुसार न्यायालय शुल्क जमा किए जाने के बाद आवेदक के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र जारी किया जाए।यह प्रमाण-पत्र मृतक के नाम संचालित एसबीआई बचत खाते में जमा राशि 45,17,036 रुपये की मूल बताई गई रकम तथा बैंक द्वारा बताई गई वर्तमान राशि 47,83,908.62 रुपये, और उस पर लागू होने वाले ब्याज (यदि कोई हो), को प्राप्त करने के लिए जारी किया जाएगा।यानी अदालत के आदेश के बाद अब संबंधित बैंक रिकॉर्ड के आधार पर उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र के जरिए राशि प्राप्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी।
मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मामला उन परिस्थितियों को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है, जब किसी बैंक खाताधारक की मृत्यु हो जाए और खाते में नॉमिनी दर्ज न हो। ऐसे मामलों में केवल बैंक खाते में रकम होने से उसका भुगतान किसी व्यक्ति को स्वतः नहीं हो जाता। उत्तराधिकार और संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी पड़ सकती है।इस मामले में मृतक का अविवाहित होना, माता-पिता का पहले निधन हो जाना, कोई अन्य दावेदार सामने नहीं आना और बैंक खाते में नॉमिनी का नहीं होना—ये सभी तथ्य अदालत के सामने रखे गए थे।
जानिए: मौत के बाद बैंक में जमा पैसे पर किसका अधिकार?
- वसीयत होने पर: यदि मृतक ने वैध वसीयत छोड़ी है, तो संपत्ति के उत्तराधिकार का निर्धारण संबंधित कानूनी प्रावधानों और वसीयत की वैधता के आधार पर किया जाता है।
- नॉमिनी और कानूनी वारिस अलग-अलग होते हैं: किसी बैंक खाते में नॉमिनी दर्ज होने का मतलब यह जरूरी नहीं कि वही व्यक्ति अंतिम रूप से उस रकम का मालिक बन जाए। उत्तराधिकार का अधिकार लागू कानून और परिस्थितियों के आधार पर तय होता है।
- वसीयत नहीं होने पर: ऐसी स्थिति में संबंधित उत्तराधिकार कानून लागू होते हैं और पात्र कानूनी वारिसों के अधिकार तय किए जाते हैं।
- नॉमिनी होने का फायदा: नॉमिनी दर्ज होने से बैंक में मृत्यु के बाद क्लेम और भुगतान की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान हो सकती है। नॉमिनी नहीं होने पर बैंक कानूनी वारिसों से अतिरिक्त दस्तावेज या उत्तराधिकार से संबंधित प्रमाण मांग सकता है।
- परिवार में बदलाव के बाद नामांकन अपडेट करें: शादी, तलाक, बच्चे के जन्म या परिवार में किसी बड़े बदलाव के बाद बैंक खाते, बीमा और निवेश से जुड़े नॉमिनी विवरण की दोबारा जांच करना जरूरी है।
- वसीयत और नॉमिनी दोनों की जानकारी सही रखें: समय-समय पर यह सुनिश्चित करें कि वसीयत और विभिन्न वित्तीय खातों में दर्ज नामांकन आपकी वर्तमान इच्छा और पारिवारिक स्थिति के अनुरूप है।
- विवाद से बचने के लिए पहले से तैयारी: सही नामांकन, वैध वसीयत और जरूरी दस्तावेज भविष्य में परिवार के बीच होने वाले विवाद और कानूनी प्रक्रिया को कम करने में मदद कर सकते हैं।










