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Bilaspur High Court Maintenance Case: शादी की वैधता पर विवाद के बावजूद पत्नी को मिलेगा भरण-पोषण, हाई कोर्ट ने पति की याचिका खारिज

Bilaspur High Court News: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा कि शादी की वैधता पर विवाद होने के बावजूद पत्नी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता। पति की याचिका खारिज, 15 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण बरकरार।

August 1, 2026 4:59 AM
Highcourt News
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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पति पत्नी के रिश्ते को लेकर बड़ा अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल शादी की वैधता पर विवाद होने के आधार पर पत्नी को भरण-पोषण (Maintenance) से वंचित नहीं किया जा सकता। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने की। भिलाई निवासी गोपाल गोपवानी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए परिवार न्यायालय द्वारा पत्नी पूजा गोपवानी के पक्ष में निर्धारित 15 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की राशि को बरकरार रखा।

शादी की वैधता पर फैसला अलग, भरण-पोषण का अधिकार अलग

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि विवाह की वैधता का प्रश्न अलग सिविल मुकदमे में तय किया जाएगा। जब तक उस मामले में अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक पत्नी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का उद्देश्य जरूरतमंद पत्नी और बच्चों को तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है। हाईकोर्ट ने साफ किया कि भरण पोषण भत्ता जीवकोपार्जन से संबंधित है, इस अधिकार से किसी को वंचित नहीं किया जा सकता है।

पति ने लगाया पहली शादी छिपाने का आरोप

याचिकाकर्ता गोपाल गोपवानी ने अदालत में दलील दी थी कि उनकी पत्नी पूजा गोपवानी ने विवाह के समय अपनी पहली शादी की जानकारी छिपाई थी। इसी आधार पर उन्होंने परिवार न्यायालय में विवाह की वैधता को चुनौती देते हुए अलग सिविल मुकदमा भी दायर किया है। हालांकि हाई कोर्ट ने कहा कि इस विवाद का असर फिलहाल पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार पर नहीं पड़ता।

पत्नी और 11 वर्षीय बेटी के लिए मांगा था भरण-पोषण

भिलाई के वैशाली नगर निवासी पूजा गोपवानी ने अपनी 11 वर्षीय बेटी और स्वयं के लिए परिवार न्यायालय में भरण-पोषण की अर्जी लगाई थी। प्रारंभ में अदालत ने 3 हजार रुपये प्रतिमाह की अंतरिम राशि निर्धारित की थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 15 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया गया।

परिवार न्यायालय का आदेश सही माना

हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद माना कि परिवार न्यायालय ने दोनों पक्षों की आय, आर्थिक स्थिति और उपलब्ध तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भरण-पोषण की राशि तय की है। इसलिए आदेश में किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है और पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज किए जाने योग्य है।

 

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