धमतरी। सावन माह के पहले सोमवार पर शिवालयों में भगवान भोलेनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। हाथों में गंगाजल, दूध, बेलपत्र और श्रीफल लिए भक्त पूरे श्रद्धाभाव से भोलेनाथ की पूजा-अर्चना कर रहे हैं। इसी क्रम में धमतरी जिले के नगरी वनांचल क्षेत्र स्थित बोरई का प्रसिद्ध आधामांझी महादेव मंदिर भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। छत्तीसगढ़, ओडिशा और बस्तर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान शिव के दर्शन कर मनोकामनाएं मांग रहे हैं।
घने जंगलों के बीच बसा है आस्था का अनोखा धाम
धमतरी जिले के बोरई क्षेत्र में घटुला से बोरई-ओडिशा-बस्तर मुख्य मार्ग पर बुडरा जाने वाले रास्ते के मोड़ के समीप घने जंगलों के बीच स्थित आधामांझी महादेव मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। प्राकृतिक वातावरण और जंगलों की शांत वादियों के बीच स्थित यह मंदिर अपनी अनोखी पहचान के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।
एक ही स्थान पर विराजमान हैं जोड़ा शिवलिंग
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित जोड़ा शिवलिंग है। एक ही स्थान पर विराजमान दो शिवलिंगों को श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती के अर्धनारीश्वर स्वरूप का प्रतीक मानते हैं। इन शिवलिंगों की स्थापना कब और कैसे हुई, इसका कोई प्रमाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है। यही रहस्य इस मंदिर को और भी विशेष बनाता है। इसी वजह से इस स्थान को आधामांझी महादेव के नाम से जाना जाता है। मंदिर परिसर में भगवान हनुमान का मंदिर भी स्थित है, जहां श्रद्धालु दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
पहले खुले स्थान पर था मंदिर
स्थानीय लोगों के अनुसार पहले यहां कोई भव्य मंदिर नहीं था। शिवलिंग खुले स्थान पर विराजमान थे। वर्ष 2010-11 के दौरान यहां मंदिर का निर्माण कराया गया, जिसके बाद श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई। हालांकि आज भी मंदिर की मूल आस्था और धार्मिक परंपरा पहले की तरह ही कायम है।
1965 से लगातार हो रही पूजा-अर्चना
बताया जाता है कि वर्ष 1965 के आसपास वर्तमान पुजारी के पूर्वजों ने यहां नियमित पूजा-अर्चना की शुरुआत की थी। तब से लेकर आज तक यह परंपरा बिना रुके जारी है। लगभग 80 वर्ष की आयु में भी वर्तमान पुजारी पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ बाबा आधामांझी महादेव की सेवा कर रहे हैं।
जंगल में रात बिताते हैं पुजारी
इस मंदिर से जुड़ा एक और रोचक पहलू श्रद्धालुओं को हैरान कर देता है। मंदिर के पुजारी आज भी घने जंगलों के बीच स्थित इसी मंदिर परिसर में रात्रि विश्राम करते हैं। आसपास जंगली जानवरों की मौजूदगी के बावजूद उन्हें कभी किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंची। पुजारी इसे भगवान आधामांझी महादेव की कृपा और संरक्षण मानते हैं।
यात्री पहले करते हैं दर्शन, फिर बढ़ते हैं आगे
बोरई-ओडिशा-बस्तर मार्ग से गुजरने वाले अधिकांश यात्री अपनी यात्रा शुरू करने से पहले इस मंदिर में रुककर भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद अवश्य लेते हैं। सावन माह में विशेष रूप से ओडिशा और बस्तर से हजारों कांवड़िए यहां पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना भगवान शिव अवश्य पूरी करते हैं।
सुविधाओं के विस्तार की मांग
श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए स्थानीय लोग और भक्त लंबे समय से मंदिर परिसर में बिजली, पेयजल, शौचालय, विश्राम स्थल और अन्य मूलभूत सुविधाओं के विस्तार की मांग कर रहे हैं, ताकि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।
सावन में और बढ़ जाती है धार्मिक महत्ता
सावन के पहले सोमवार पर आधामांझी महादेव मंदिर में उमड़ी श्रद्धा ने एक बार फिर इस प्राचीन और अनोखे शिवधाम की धार्मिक महत्ता को उजागर कर दिया। जंगलों के बीच स्थित यह मंदिर आज भी अपनी रहस्यमयी पहचान, जोड़ा शिवलिंग और अटूट आस्था के कारण हजारों श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।



















