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CG High Court: 1998 में PSC से चयनित 13 अफसरों को राहत, मूल विभाग में वापसी और पदोन्नति पर 90 दिन में फैसला

CG High Court: 1998 में PSC से चयनित 13 अफसरों को राहत, मूल विभाग में वापसी और पदोन्नति पर 90 दिन में फैसला

August 9, 2026 6:04 AM
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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने  PSC अफसरों से जुड़े अहम मामले पर फैसला सुनाया है। साल 1998 में नियुक्त किए गए 13 अधिकारियों से जुड़े लंबे समय से लंबित सेवा विवाद में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने अधिकारियों को अपनी मांगों को लेकर सक्षम अधिकारी के सामने दोबारा अभ्यावेदन पेश करने की छूट दी है। इसके साथ ही शासन को निर्देश दिया गया है कि अभ्यावेदन मिलने के बाद निर्धारित समय सीमा में कानून के मुताबिक निर्णय लिया जाए।

यह मामला अतिरिक्त सहायक विकास आयुक्त के पद पर चयनित अधिकारियों की विभागीय स्थिति, वरिष्ठता और पदोन्नति से जुड़ा हुआ है। न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने मोहित राम कैवर्त सहित 13 अधिकारियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था दी।

1996 के PSC विज्ञापन से हुआ था चयन

हाईकोर्ट में दायर याचिकाकर्ताओं के मुताबिक वर्ष 1996 में तत्कालीन मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग ने अतिरिक्त सहायक विकास आयुक्त के पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद वर्ष 1998 में उनकी नियुक्ति की गई। नियुक्ति के समय अधिकारियों को आदिम जाति कल्याण विभाग के अधीन पदस्थ किया गया। अधिकारियों का कहना है कि उनके पद का मूल कार्यक्षेत्र पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग से जुड़ा था। इसी आधार पर उन्होंने अपनी सेवाएं मूल विभाग में स्थानांतरित करने की मांग उठाई।

वरिष्ठता सूची और काल्पनिक पदोन्नति की भी मांग

अधिकारियों ने अपनी याचिका में केवल विभाग परिवर्तन की मांग नहीं की, बल्कि सेवा से जुड़े अन्य लाभ भी मांगे। इनमें मूल विभाग में वापसी के साथ एकीकृत वरिष्ठता सूची तैयार करना और वरिष्ठता के आधार पर काल्पनिक पदोन्नति का लाभ शामिल है।याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनकी परिस्थितियां दूसरे समान मामलों से मिलती हैं।

इसी क्रम में उन्होंने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के अनुराग सक्सेना बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया।उनका कहना था कि जब समान परिस्थितियों वाले अधिकारियों के मामले में न्यायिक स्तर पर सिद्धांत निर्धारित किया जा चुका है, तो उनके मामले पर भी उसी कानूनी आधार पर विचार किया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने मांगी थी सीमित राहत

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अधिकारियों की ओर से हाई कोर्ट से सीधे कोई अंतिम लाभ देने की मांग के बजाय सीमित राहत मांगी गई। उनका आग्रह था कि शासन के समक्ष पहले से लंबित अभ्यावेदन पर संबंधित न्यायिक निर्णय को ध्यान में रखते हुए समयबद्ध तरीके से फैसला लेने का निर्देश दिया जाए।

सरकार ने बताया, कई अधिकारी हो चुके हैं रिटायर

राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया गया। शासन की ओर से अदालत को बताया गया कि यह मामला वर्ष 2018 से लंबित है और इस अवधि में अधिकांश याचिकाकर्ता सेवानिवृत्त हो चुके हैं। सरकार ने इसी आधार पर कहा कि मौजूदा स्थिति में याचिका के माध्यम से प्रभावी राहत देने का औचित्य नहीं रह गया है।

45 दिन में देना होगा नया अभ्यावेदन

हाई कोर्ट ने मामले के मूल विवाद पर कोई अंतिम राय नहीं दी। अदालत ने अधिकारियों को अपनी मांगों को लेकर नया अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी है।कोर्ट के निर्देश के अनुसार, याचिकाकर्ता आदेश की तारीख से 45 दिनों के भीतर अपर मुख्य सचिव, आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग के समक्ष अपना अभ्यावेदन पेश कर सकते हैं।

शासन को 90 दिन में करना होगा फैसला

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि सक्षम प्राधिकारी को अभ्यावेदन प्राप्त होने के बाद 90 दिनों के भीतर उस पर कानून के अनुसार निर्णय लेना होगा।निर्णय लेते समय मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के अनुराग सक्सेना मामले में निर्धारित कानूनी सिद्धांतों को भी ध्यान में रखने का निर्देश दिया गया है।

इस तरह हाई कोर्ट ने फिलहाल अधिकारियों को सीधे मूल विभाग में स्थानांतरण या पदोन्नति का लाभ देने का आदेश नहीं दिया है। हालांकि, नया अभ्यावेदन दाखिल करने और उस पर समय सीमा के भीतर निर्णय लेने का रास्ता साफ कर दिया है। अब शासन के निर्णय पर इन अधिकारियों की विभागीय स्थिति, वरिष्ठता और पदोन्नति से जुड़ी मांगों का भविष्य निर्भर करेगा।

 

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