बिलासपुर। लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) की लगातार सख्ती और बार-बार जारी आदेशों के बावजूद बिलासपुर जिले में शिक्षकों के अवैध अटैचमेंट का मामला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। कई रसूखदार शिक्षक अभी भी अपनी अटैचमेंट की कुर्सी बचाये रखने में कामयाब है। शिक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जिले में अब भी 34 शिक्षक और कर्मचारी विभिन्न विभागों में अटैच हैं, जबकि स्कूलों में शिक्षकों की कमी से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। सवाल यह है कि जब डीपीआई कई बार आदेश जारी कर चुका है, तब भी आखिर इन कर्मचारियों को बचा कौन रहा है?
चार-चार आदेश… फिर भी नहीं हुआ पालन
आपको बता दें कि लोक शिक्षण संचालनालय ने शिक्षकों को मूल पदस्थापना पर भेजने के लिए 12 जून, 17 जून, 25 जून, 7 जुलाई और फिर 12 जुलाई को भी सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश जारी किए। इतना ही नहीं, संचालनालय स्तर से लगातार फोन कर कार्रवाई के निर्देश दिए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर आदेशों का असर बेहद सीमित नजर आया। जबकि डीपीआई ने स्पष्ट कह दिया है कि अटैचमेंट से लौटे बिना जुलाई महीने का वेतन रिलीज नहीं होगा। वहीं ब्रेक इन सर्विस की भी चेतावनी दी गयी है।
53 रिलीव हुए, फिर भी 34 अब तक जमे
पहले सहायक संचालक वर्षा शर्मा ने कार्रवाई करते हुए 15 शिक्षक-कर्मचारियों को मूल पदस्थापना पर भेजा। इसके बाद प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी बनने पर अजय कौशिक ने 38 और शिक्षक-कर्मचारियों को रिलीव किया। इसके बावजूद 34 शिक्षक-कर्मचारी अब भी विभिन्न विभागों में अटैच हैं।यानी कार्रवाई हुई जरूर, लेकिन पूरी नहीं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या कुछ लोगों को जानबूझकर संरक्षण दिया जा रहा है?
स्कूल खाली, दफ्तरों में शिक्षक!
स्थिति यह है कि जिले के कई सरकारी स्कूल आज भी शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर, कई शिक्षक वर्षों से डीईओ कार्यालय, कलेक्टोरेट, तहसील कार्यालय, जिला निर्वाचन शाखा और जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों में गैर-शैक्षणिक कार्य करते रहे। कई शिक्षकों से डेटा एंट्री, कार्यालयी काम और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी कराई जाती रहीं, जबकि उनका मूल दायित्व बच्चों को पढ़ाना है।
प्रभारी डीईओ बोले- नाम तक नहीं पता
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी अजय कौशिक से मीडिया ने पूछा कि अभी किन-किन शिक्षक-कर्मचारियों का अटैचमेंट बाकी है, तो उन्होंने कहा कि उन्हें नामों की जानकारी नहीं है।उनका कहना था कि सभी कर्मचारी उनके कार्यालय में नहीं हैं, कुछ अलग-अलग ब्लॉकों में भी अटैच हैं। फिलहाल केवल संख्या मंगाई गई है। अगर जिला शिक्षा अधिकारी को यदि यह तक पता नहीं कि जिले में कौन-कौन से शिक्षक अब भी अटैच हैं, तो कार्रवाई कितनी गंभीरता से हो रही है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
आदेशों की अवहेलना या अधिकारियों की मजबूरी?
डीपीआई का स्पष्ट निर्देश है कि शिक्षकों से गैर-शैक्षणिक कार्य न कराए जाएं और सभी को उनकी मूल शालाओं में भेजा जाए। इसके बावजूद महीनों से अटैचमेंट जारी रहना कई सवाल खड़े करता है। क्या विभागीय आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? या फिर कुछ प्रभावशाली लोगों के कारण कार्रवाई अधूरी छोड़ दी गई?
सबसे बड़ा सवाल
जब सरकार स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करने की बात कर रही है, तब 34 शिक्षक अब भी कार्यालयों की शोभा क्यों बढ़ा रहे हैं? यदि आदेशों का पालन नहीं होना है, तो फिर बार-बार पत्र जारी करने का औचित्य क्या रह जाता है?


















