बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने नियमितीकरण को लेकर बड़ा अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने दैनिक वेतनभोगियों के नियमितिकरण पर 90 दिनों में फैसला लेने को कहा है। पूरा मामला गरियाबंद जिले के आदिवासी बालक आश्रमों और छात्रावासों में कार्यरत कर्मियों से जुड़ा है। यहां लंबे समय से दैनिक वेतनभोगी के तौर पर सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण के मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने विभाग को याचिकाकर्ताओं के सेवा रिकॉर्ड की तुलना वर्ष 2022 और 2024 में नियमित किए गए कर्मचारियों के अभिलेखों से करने को कहा है।
न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने नियमितिकरण में समान लाभ दिये जाने की याचिका पर सुनवाई करते हुए विभाग को निर्देश दिया है। दरअसल हाईकोर्ट में लोचन प्रसाद पांडेय सहित अन्य कर्मचारियों की ओर से याचिका दायर की गयी थी। हाईकोर्ट में दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सिंगल बेंच ने यह आदेश दिया। अदालत ने कहा है कि रिकॉर्ड की जांच के बाद यदि याचिकाकर्ताओं की सेवा संबंधी स्थिति नियमित किए गए कर्मचारियों के समान पाई जाती है, तो उन्हें भी उसी तारीख से नियमितीकरण का लाभ दिया जाए।
90 दिन में पूरी करनी होगी प्रक्रिया
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित विभाग को पूरी प्रक्रिया आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से 90 दिनों के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है। इससे लंबे समय से नियमितीकरण की प्रतीक्षा कर रहे कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है।
16 साल से अधिक समय से कर रहे हैं सेवा
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे गरियाबंद जिले के अलग-अलग आदिवासी बालक आश्रमों और छात्रावासों में कई वर्षों से दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, समान पद और योग्यता वाले कई कर्मचारियों को नियमित किया जा चुका है, लेकिन उन्हें अब तक यह लाभ नहीं मिला।
कर्मचारियों ने अपनी याचिका में शासन के 5 मार्च 2008 के परिपत्र का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि इसी आधार पर विभाग ने 28 फरवरी 2022 और 18 अक्टूबर 2024 को समान परिस्थितियों में काम कर रहे कई दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों का नियमितीकरण किया था।
समान सेवा होने पर मिलेगा पिछली तारीख से लाभ
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि जब समान योग्यता, पद और सेवा अवधि वाले कर्मचारियों को नियमितीकरण का लाभ दिया गया है, तो समान परिस्थितियों में काम करने वाले अन्य कर्मचारियों को इससे अलग रखना उचित नहीं है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के नरेंद्र कुमार तिवारी बनाम झारखंड राज्य मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया गया।
हाई कोर्ट ने फिलहाल सभी याचिकाकर्ताओं को सीधे नियमित करने का आदेश नहीं दिया है। अदालत ने विभाग को पहले दोनों पक्षों के सेवा अभिलेखों और परिस्थितियों का मिलान करने को कहा है। जांच में यदि समानता सामने आती है, तो याचिकाकर्ताओं को भी समान तिथि से नियमितीकरण का लाभ देना होगा।
इस आदेश के बाद गरियाबंद जिले के आदिवासी आश्रमों और छात्रावासों में वर्षों से दैनिक वेतन पर सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण के मामलों में विभागीय स्तर पर दोबारा विचार का रास्ता खुल गया है।



















