बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि पति अच्छी आय अर्जित करता है, पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिल जाता। यदि पत्नी के पास पति से अलग रहने का कोई उचित और ठोस कारण साबित नहीं होता है, तो भरण-पोषण की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
हालांकि, अदालत ने दंपती की सात वर्षीय बेटी के लिए तय 5,000 रुपये प्रतिमाह की भरण-पोषण राशि को उचित माना है। हाई कोर्ट ने रायपुर कुटुंब न्यायालय के आदेश में दखल देने से इनकार करते हुए पत्नी की याचिका खारिज कर दी।
2015 में हुई थी शादी, 2021 से अलग रह रहे दंपती
दरअसल ये पूरा मामला निर्मला जैन और केशव लाल जैन से जुड़ा है। दोनों का विवाह 25 मई 2015 को हुआ था। दंपती की एक बेटी है। वैवाहिक विवाद के बाद दोनों अक्टूबर 2021 से अलग रह रहे हैं। लेकिन सुनवाई के दौरान जब इस मामले में उचित कारण जानना चाहा गया तो पत्नी की तरफ से इस संबंध में कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया।
केशव लाल जैन नारायणपुर जिले के ओरछा ब्लॉक में शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं और उनकी मासिक आय करीब 71,220 रुपये बताई गई है। पत्नी ने इसी आय का हवाला देते हुए कुटुंब न्यायालय में अपने लिए भरण-पोषण की मांग की थी।
कुटुंब न्यायालय ने पत्नी की मांग ठुकराई
रायपुर कुटुंब न्यायालय ने 1 जुलाई 2026 को मामले की सुनवाई करते हुए पत्नी के भरण-पोषण संबंधी आवेदन को स्वीकार नहीं किया। अदालत के मुताबिक पत्नी यह साबित नहीं कर सकीं कि पति से अलग रहने के पीछे उनके पास कोई पर्याप्त और वैध वजह थी।हालांकि, नाबालिग बेटी के लिए न्यायालय ने 5,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण निर्धारित किया।
पत्नी ने हाई कोर्ट में दी चुनौती
कुटुंब न्यायालय के फैसले से असंतुष्ट पत्नी ने हाई कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दाखिल की। उनकी ओर से पति की आय का हवाला देते हुए कहा गया कि उनकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्हें भी भरण-पोषण मिलना चाहिए।मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने की।
धारा 125 के तहत क्या देखा जाएगा?
हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर विचार करते हुए कहा कि धारा 125 के तहत पत्नी के दावे पर विचार करते समय यह देखना जरूरी है कि क्या पति ने पत्नी की उपेक्षा की है या उसके भरण-पोषण से इनकार किया है।अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और साक्ष्यों का परीक्षण किया। कोर्ट को ऐसा कोई पर्याप्त आधार नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि पत्नी का पति से अलग रहना किसी मजबूरी या उचित कारण की वजह से था।
सिर्फ पति की ज्यादा सैलरी पर्याप्त आधार नहीं
हाई कोर्ट ने साफ किया कि पति की आय अधिक होना अपने आप में पत्नी के भरण-पोषण के दावे को स्वीकार करने का आधार नहीं बन सकता। इसके लिए कानून में निर्धारित अन्य परिस्थितियों और पति-पत्नी के अलग रहने के कारणों की भी जांच जरूरी है।अदालत ने पाया कि पत्नी यह स्थापित करने में असफल रही कि उसके पास पति से अलग रहने का उचित कारण था। ऐसे में कुटुंब न्यायालय द्वारा पत्नी के भरण-पोषण आवेदन को खारिज करना कानूनी रूप से गलत नहीं था।
बेटी के लिए ₹5,000 प्रतिमाह राशि बरकरार
हाई कोर्ट ने नाबालिग बेटी के हित को अलग माना। अदालत ने उसके लिए तय 5 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण को उचित माना और इस हिस्से में भी कोई बदलाव नहीं किया।कोर्ट ने कहा कि कुटुंब न्यायालय के आदेश में ऐसी कोई कानूनी त्रुटि नहीं है जिसके आधार पर हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े। इसी के साथ पत्नी की क्रिमिनल रिवीजन खारिज कर दी गई।
फैसले का अहम संदेश
इस मामले में हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का दावा केवल पति की आर्थिक क्षमता देखकर तय नहीं किया जा सकता। पत्नी के अलग रहने के कारण और पति की ओर से उपेक्षा या भरण-पोषण से इनकार जैसे कानूनी पहलुओं का भी परीक्षण आवश्यक है। वहीं नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण का अधिकार अलग से सुरक्षित रहता है।



















