बिलासपुर। अनुकंपा नियुक्ति पर हाईकोर्ट बड़ा अहम फैसला सुनाया है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि सिर्फ विवाहित होने के आधार पर किसी बेटी को मृतक कर्मचारी का आश्रित मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि विवाह के बाद बेटी का अपने माता-पिता से संबंध समाप्त मानना संविधान के समानता के अधिकार के विपरीत है और यह सोच लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देती है।
बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ बैंक ऑफ महाराष्ट्र के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक महिला का अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन केवल उसके विवाहित होने के आधार पर खारिज कर दिया गया था।
‘शादी’ आश्रित होने का पैमाना नहीं : हाईकोर्ट
न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने अफीफा खान उर्फ देवांगी चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति के आश्रित होने का निर्धारण उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति से होगा, न कि उसकी वैवाहिक स्थिति से।अदालत ने कहा कि यदि विवाहित बेटे को आश्रित माना जा सकता है, तो केवल शादी के कारण विवाहित बेटी को इस अधिकार से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 की भावना के विपरीत होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के ‘कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026)’ मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि सर्वोच्च अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि शादी के बाद भी बेटी का अपने माता-पिता से कानूनी और पारिवारिक संबंध खत्म नहीं होता।इसी सिद्धांत को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में भी यही संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
बैंक का आदेश रद्द, 30 दिन में नया फैसला लेने का निर्देश
अदालत ने पाया कि बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने बिना किसी तथ्यात्मक जांच के केवल विवाह को आधार बनाकर यह निष्कर्ष निकाल लिया कि याचिकाकर्ता अपने पिता पर आश्रित नहीं थी।हाईकोर्ट ने 27 अक्टूबर 2026 को जारी बैंक के आदेश को निरस्त करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर सुप्रीम कोर्ट के तय सिद्धांतों के अनुरूप 30 दिनों के भीतर नए सिरे से कारणयुक्त निर्णय लिया जाए।
महिलाओं के अधिकारों पर अहम फैसला
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला केवल एक याचिकाकर्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति के ऐसे मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा। इससे यह संदेश गया है कि सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों को नियुक्ति संबंधी निर्णय लेते समय लैंगिक समानता और संवैधानिक मूल्यों का पालन करना होगा।



















