School Teacher News। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शिक्षाकर्मियों के संविलियन और पेंशन को लेकर अहम फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की रिट अपील को खारिज करते हुए सिंगल बेंच के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि सरकार शिक्षाकर्मियों की संविलियन से पहले की सेवा अवधि को पेंशन के लिए शामिल किए जाने के मुद्दे पर पुनर्विचार कर स्पष्ट नीति बनाए।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल छत्तीसगढ़ के बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के कुसमी विकासखंड में पदस्थ शशांक भूषण दुबे, परमेश्वर मिश्रा, सुनील तिवारी सहित 72 शिक्षकों और व्याख्याताओं ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनकी नियुक्ति 1998 से 2008 के बीच शिक्षाकर्मी के रूप में हुई थी। बाद में राज्य सरकार ने 1 जुलाई 2018 से उनका स्कूल शिक्षा विभाग में संविलियन कर दिया। लेकिन पेंशन के लिए उनकी सेवा की गणना केवल संविलियन की तारीख से की जा रही है।
शिक्षकों ने क्या उठाया सवाल?
शिक्षकों का कहना था कि उन्होंने शिक्षाकर्मी के रूप में 10 से 15 वर्ष तक सरकारी नियंत्रण में सेवा दी है। यदि पेंशन के लिए सेवा की गणना केवल 1 जुलाई 2018 से होगी, तो उनकी पूर्व सेवा का कोई लाभ नहीं मिलेगा। मौजूदा नियमों के अनुसार पेंशन के लिए कम से कम 10 वर्ष की अर्हता सेवा जरूरी है। ऐसे में कई शिक्षकों को 1 जुलाई 2028 तक इंतजार करना पड़ सकता है।
सिंगल बेंच ने क्या कहा था?
23 जनवरी 2026 को हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने राज्य सरकार को यह निर्देश दिया था कि वह शिक्षाकर्मियों की संविलियन से पहले की सेवा अवधि को पेंशन के उद्देश्य से शामिल करने के मुद्दे पर पुनर्विचार करे और स्पष्ट नीति बनाए।हालांकि, सिंगल बेंच ने सरकार को सीधे पूर्व सेवा जोड़कर पेंशन देने का आदेश नहीं दिया था।
सरकार ने क्यों की अपील?
सिंगल बेंच के आदेश के खिलाफ सामान्य प्रशासन विभाग, वित्त विभाग और स्कूल शिक्षा विभाग ने डिवीजन बेंच में रिट अपील दायर की।
सरकार का तर्क था कि:
• संविलियन की शर्तें पहले से निर्धारित हैं।
• पूर्व सेवा को पेंशन में जोड़ने से राज्य पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा।
• सिंगल बेंच का आदेश सरकार की नीतिगत शक्तियों में हस्तक्षेप जैसा है।
डिवीजन बेंच ने क्या कहा?
डिवीजन बेंच ने सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट किया कि सिंगल बेंच ने सरकार को कोई निश्चित नीति अपनाने का आदेश नहीं दिया था, बल्कि केवल इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार कर उचित नीति बनाने के लिए कहा था।
अदालत ने कहा कि सरकार को निम्न बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए—
• शिक्षाकर्मी के रूप में दी गई सेवा की अवधि।
• किए गए कार्य की प्रकृति।
• उस दौरान कर्मचारियों पर सरकार का प्रशासनिक नियंत्रण।
• संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और निष्पक्षता के सिद्धांत।
कोर्ट ने सरकार को क्या सलाह दी?
हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार ऐसी स्पष्ट और पारदर्शी नीति बनाए जिससे समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार हो। इससे भविष्य में इस मुद्दे पर बार-बार अदालतों का दरवाजा खटखटाने की नौबत भी नहीं आएगी।
शिक्षकों के लिए फैसले का क्या मतलब?
यह फैसला शिक्षाकर्मियों को तत्काल पूर्व सेवा का पेंशन लाभ देने का आदेश नहीं है, लेकिन उनके पक्ष में एक महत्वपूर्ण कानूनी राहत है।अब राज्य सरकार को शिक्षाकर्मियों की संविलियन से पहले की सेवा अवधि को पेंशन के लिए मान्यता देने के मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर स्पष्ट नीति बनानी होगी। यदि सरकार सकारात्मक निर्णय लेती है, तो हजारों शिक्षक-एलबी को इसका लाभ मिल सकता है।



















