CG High Court Forest Development Corporation Promotion Rules। सेवा नियमों में बदलाव किये बगैर प्रमोशन का आधार नहीं बदला जा सकता है, इस दलील के साथ छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने प्रमोशन आदेश पर रोक लगा दी। ये पूरा मामला छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम (CSFDC) में पदोन्नति से जुड़ा है। जहां प्रमोशन के नियम बदलने के राज्य सरकार और निगम के फैसले को अवैध घोषित करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सेवा नियमों (Service Rules) में संशोधन किए बिना केवल प्रशासनिक आदेश से प्रमोशन का आधार नहीं बदला जा सकता। कोर्ट ने सरकार की उस मंजूरी को भी रद्द कर दिया, जिसमें ‘सीनियरिटी-कम-सूटेबिलिटी (Seniority-cum-Suitability)’ की जगह ‘मेरिट-कम-सीनियरिटी (Merit-cum-Seniority)’ के आधार पर पदोन्नति देने की अनुमति दी गई थी।यह फैसला छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम के प्रोजेक्ट रेंज अधिकारियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है और भविष्य में अन्य विभागों की पदोन्नति प्रक्रियाओं पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल भिलाई निवासी विनीत कुमार सिंह सहित विवेक देवांगन, महेश खटकर, शिल्पी नरेड़िया, जागेश कुमार गोंड, जयपाल सिंह पवार, सरिता सिदार और अभिनंदन गोस्वामी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में बताया था कि 16 अप्रैल 2026 को वन विकास निगम के बोर्ड के प्रस्ताव और 12 जून 2026 को राज्य सरकार द्वारा दी गई प्रशासनिक स्वीकृति को चुनौती दी थी। इन आदेशों के तहत प्रत्यक्ष भर्ती के रिक्त पदों को पदोन्नति से भरते समय Merit-cum-Seniority का सिद्धांत लागू करने की अनुमति दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा?
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उनकी नियुक्ति वर्ष 2017 में प्रत्यक्ष भर्ती के माध्यम से प्रोजेक्ट रेंज अधिकारी के पद पर हुई थी और वे 2022 से पदोन्नति के पात्र हैं।उन्होंने दलील दी कि छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम सेवा विनियम, 1984 के विनियम 21(2)(स) के अनुसार पदोन्नति का आधार सीनियरिटी-कम-सूटेबिलिटी है। इसके बावजूद बिना नियमों में संशोधन किए बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने प्रमोशन का आधार बदल दिया, जिससे वरिष्ठ कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित हो रहे थे।
सरकार ने क्या दलील दी?
राज्य सरकार और वन विकास निगम ने अदालत में कहा कि प्रत्यक्ष भर्ती के लिए योग्य उम्मीदवार उपलब्ध नहीं होने के कारण तत्काल रिक्त पद भरने के उद्देश्य से यह अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था की गई थी।सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि 12 जून 2026 की प्रशासनिक स्वीकृति केवल वर्तमान रिक्तियों को भरने के लिए थी और इससे सेवा नियमों में कोई संशोधन नहीं किया गया।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की एकलपीठ ने कहा कि जब स्वयं सरकार और निगम यह स्वीकार कर रहे हैं कि सेवा विनियमों में कोई संशोधन नहीं किया गया है, तब केवल प्रशासनिक आदेश या बोर्ड का प्रस्ताव वैधानिक नियमों से ऊपर नहीं हो सकता।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि—
“यदि किसी कार्य को करने की प्रक्रिया कानून में निर्धारित है, तो उसे उसी प्रक्रिया के अनुसार किया जाना अनिवार्य है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक विनियम 21(2)(स) में विधिवत संशोधन नहीं किया जाता, तब तक पदोन्नति का आधार सीनियरिटी-कम-सूटेबिलिटी ही रहेगा।
कोर्ट ने कौन-कौन से आदेश किए निरस्त?
हाई कोर्ट ने—
- 16 अप्रैल 2026 को वन विकास निगम के बोर्ड द्वारा जारी प्रस्ताव को निरस्त किया।
- 12 जून 2026 को राज्य सरकार की प्रशासनिक स्वीकृति को भी रद्द कर दिया।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि राज्य सरकार भविष्य में कानून के अनुसार सेवा विनियमों में संशोधन करती है, तो नए नियमों के तहत पदोन्नति प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
फैसले का क्या होगा असर?
इस फैसले के बाद फिलहाल वन विकास निगम में पदोन्नति सीनियरिटी-कम-सूटेबिलिटी के आधार पर ही होगी। यह निर्णय उन कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां बिना सेवा नियमों में संशोधन किए प्रशासनिक आदेशों के जरिए प्रमोशन नीति बदलने की कोशिश की जाती है।



















