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High Court Big Decision: कर्मचारी की मौत के समय लागू नीति से ही मिलेगी अनुकंपा नियुक्ति, बाद के नियम नहीं होंगे लागू, दिवंगत पुलिसकर्मी के परिजन को मिलेगा लाभ

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति पर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की मृत्यु के समय लागू नीति के आधार पर ही आश्रित के दावे का फैसला होगा, बाद के संशोधित नियम लागू नहीं होंगे।

July 12, 2026 3:29 AM
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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय जो अनुकंपा नियुक्ति नीति प्रभावी थी, उसी के आधार पर आश्रित के आवेदन पर फैसला किया जाएगा। बाद में लागू की गई संशोधित नीति या सर्कुलर के जरिए पहले से प्राप्त अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।

ये फैसला न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने हेड कांस्टेबल स्वर्गीय देवजी मंडावी की दूसरी पत्नी रुखमणी मंडावी और उनके पुत्र उमेश मंडावी की याचिका स्वीकार करते हुए 31 जुलाई 2021 के विभागीय आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने राज्य शासन को 90 दिनों के भीतर वर्ष 2013 की अनुकंपा नियुक्ति नीति के अनुसार नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया।

2016 में कर्मचारी की मृत्यु, पुत्र था नाबालिग

कोर्ट में दायर याचिका के अनुसार, कांकेर जिले के ग्राम झिपटोला चारामा निवासी स्वर्गीय देवजी मंडावी छत्तीसगढ़ पुलिस में हेड कांस्टेबल थे। 11 मई 2016 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया। उनके परिवार में पहली और दूसरी पत्नी सहित दोनों परिवारों के बच्चे आश्रित थे। दूसरी पत्नी रुखमणी मंडावी का पुत्र उमेश उस समय नाबालिग था। इसलिए जुलाई 2016 में रुखमणी मंडावी ने विभाग से अनुरोध किया कि बेटे के बालिग होने तक अनुकंपा नियुक्ति का दावा सुरक्षित रखा जाए। उमेश 26 मई 2018 को बालिग हुआ, जिसके बाद नियुक्ति के लिए आवेदन किया गया।

विभाग ने 2021 में खारिज किया आवेदन

पुलिस विभाग ने 31 जुलाई 2021 को आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मृत कर्मचारी की पहली पत्नी का पुत्र हिमेश्वर मंडावी पहले से पुलिस विभाग में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है। ऐसे में परिवार के दूसरे सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती।इस आदेश को चुनौती देते हुए रुखमणी मंडावी और उमेश मंडावी ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट ने 2013 की नीति को माना लागू

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की मृत्यु 11 मई 2016 को हुई थी। उस समय 14 जून 2013 की अनुकंपा नियुक्ति नीति लागू थी। इस नीति के क्लॉज 15(8) में स्पष्ट व्यवस्था थी कि यदि आश्रित नाबालिग हो तो उसके बालिग होने तक अनुकंपा नियुक्ति का दावा सुरक्षित रहेगा।अदालत ने कहा कि वर्ष 2013 की नीति में कहीं भी यह प्रावधान नहीं था कि परिवार का कोई सदस्य सरकारी नौकरी में होने पर दूसरे आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित किया जाएगा।

बाद में जोड़ी गई शर्त लागू नहीं होगी

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि परिवार के किसी सदस्य के सरकारी सेवा में होने पर दूसरे आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति से अयोग्य ठहराने की शर्त 29 अगस्त 2016 के संशोधन से जोड़ी गई थी। चूंकि कर्मचारी की मृत्यु इससे पहले हो चुकी थी, इसलिए यह संशोधित नियम इस मामले पर लागू नहीं किया जा सकता।कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी की मृत्यु के साथ ही आश्रित का अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार उत्पन्न हो जाता है। ऐसे अधिकार को बाद में लागू किसी संशोधन या नई नीति के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

90 दिनों में करना होगा नया फैसला

हाई कोर्ट ने राज्य शासन को निर्देश दिया कि उमेश मंडावी के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर 14 जून 2013 की नीति के अनुसार दोबारा विचार किया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में 29 अगस्त 2016 के संशोधन और 23 फरवरी 2019 के संकलित सर्कुलर में जोड़ी गई अपात्रता की शर्तों को लागू नहीं किया जाएगा।हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि विभाग अन्य वैधानिक पात्रता शर्तों की जांच कर सकता है, लेकिन पूरी प्रक्रिया 90 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी।

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