बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शिक्षकों की सेवानिवृत्ति के समय कर्मचारियों को पात्रता से अधिक भुगतान पर अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद ग्रेच्युटी की राशि की वसूली को चुनौती देने वाली दो याचिकाएं खारिज कर दी हैं। न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल विभागीय गलती से किसी कर्मचारी को अधिक राशि का भुगतान हो जाने से उसे सरकारी धन अपने पास रखने का अधिकार नहीं मिल जाता।
हाईकोर्ट ने कहा कि कानूनन देय राशि से अधिक किए गए सरकारी भुगतान की वसूली सामान्य नियम है। इससे छूट केवल विशेष और सीमित परिस्थितियों में ही दी जा सकती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम रफीक मसीह फैसले में बताए गए अपवाद हर अतिरिक्त भुगतान के मामले में स्वतः लागू नहीं होते।
दो सेवानिवृत्त शिक्षकों ने दी थी चुनौती
पहला मामला मुंगेली जिले के ग्राम रामकापा निवासी 64 वर्षीय कालीराम कुर्रे से जुड़ा है। वे 30 जून 2024 को सेवानिवृत्त हुए थे। रिटायरमेंट के समय विभाग ने उन्हें ग्रेच्युटी का भुगतान किया। बाद में विभागीय गणना में पता चला कि उन्हें उनकी वास्तविक पात्रता से अधिक राशि दे दी गई थी। इसके बाद 5 जून 2026 को विभाग ने अतिरिक्त भुगतान की राशि की वसूली का आदेश जारी किया।
दूसरा मामला मुंगेली निवासी 63 वर्षीय शंकर दास धिरही का है। वे 31 जनवरी 2025 को सेवानिवृत्त हुए थे। उन्हें भी विभाग की ओर से पात्रता से अधिक ग्रेच्युटी का भुगतान किया गया था। बाद में 5 जून 2026 को अतिरिक्त राशि की वसूली के लिए आदेश जारी किया गया।दोनों कर्मचारियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर वसूली आदेश को चुनौती दी थी।
रफीक मसीह के फैसले का दिया हवाला
याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम रफीक मसीह (2015) के फैसले का हवाला दिया गया। उनका तर्क था कि यदि कर्मचारी की गलती के बिना विभाग ने अतिरिक्त राशि का भुगतान किया है, तो उससे उस राशि की वसूली नहीं की जानी चाहिए।याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी दलील दी गई कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों से कुछ परिस्थितियों में अतिरिक्त भुगतान की वसूली पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है।
राज्य ने कहा- सरकारी राशि की वसूली जरूरी
राज्य सरकार की ओर से इन दलीलों का विरोध किया गया। सरकार ने कोर्ट को बताया कि दोनों कर्मचारियों को उनकी वैधानिक पात्रता से अधिक ग्रेच्युटी का भुगतान हुआ था। अतिरिक्त राशि कर्मचारियों को कानून के तहत देय नहीं थी, इसलिए सरकारी धन की वापसी की जानी जरूरी है। राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि रफीक मसीह के फैसले में बताई गई परिस्थितियां हर मामले में लागू नहीं होतीं।
अतिरिक्त राशि की जानकारी विभाग को देनी चाहिए थी
कालीराम कुर्रे के मामले में हाई कोर्ट ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि जब उन्हें अपनी पात्रता से अधिक ग्रेच्युटी मिली, तब उन्हें विभाग को इस अतिरिक्त भुगतान की जानकारी देनी चाहिए थी।कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी को यदि पता है कि उसे उसकी पात्रता से अधिक सरकारी राशि मिली है, तो वह उस अतिरिक्त राशि को अपने पास रखने का अधिकार नहीं जता सकता।
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अतिरिक्त भुगतान की वसूली के लिए कर्मचारी की ओर से धोखाधड़ी या गलत जानकारी देना जरूरी नहीं है। यदि भुगतान कानूनन देय राशि से अधिक है और मामले में रफीक मसीह के सीमित अपवाद लागू नहीं होते हैं, तो अतिरिक्त सरकारी राशि की वसूली की जा सकती है।
हाई कोर्ट ने दोनों याचिकाएं की खारिज
मामले की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने दोनों कर्मचारियों की याचिकाएं खारिज कर दीं। इस फैसले से स्पष्ट है कि विभागीय गणना की गलती से सेवानिवृत्ति के समय मिली अतिरिक्त ग्रेच्युटी की राशि पर कर्मचारी का स्वतः अधिकार नहीं बन जाता। हालांकि, वसूली से छूट का सवाल मामले की परिस्थितियों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित अपवादों के आधार पर तय किया जाएगा।


















