बिलासपुर। वेतन कौटती के आदेश को लेकर हाईकोर्ट ने बड़ा अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि बिना नोटिस के वेतन कटौती नहीं की जा सकती है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नक्सल हिंसा में शहीद पुलिसकर्मी की पत्नी के वेतन में की गई कटौती को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पुलिस अधीक्षक (एसपी), बालोद द्वारा जारी वेतन कटौती के आदेश को निरस्त कर दिया।
हाईकोर्ट ने फैसले सुनाते हुए कहा कि किसी कर्मचारी के वेतन में कटौती या पुनर्निर्धारण करने से पहले उसे नोटिस देना और अपना पक्ष रखने का अवसर देना अनिवार्य है। ऐसा किए बिना जारी किया गया आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि वेतन निर्धारण व कटौती के लिए सिविल सेवा का जो नियम बना है, उसका पालन करना जरूरी है।
अनुकंपा नियुक्ति के बाद घटा दिया गया था वेतन
याचिकाकर्ता जयश्री कौशिक के पति विनोद कौशिक नक्सल विरोधी अभियान के दौरान शहीद हो गए थे। इसके बाद जयश्री कौशिक को 18 सितंबर 2018 को जिला बल, बालोद में सब-इंस्पेक्टर (मिनिस्ट्रियल) के पद पर अनुकंपा नियुक्ति दी गई। नियुक्ति के समय उन्हें नियमानुसार वेतनमान भी स्वीकृत किया गया था।
हालांकि, बाद में 14 जनवरी 2020 को पुलिस अधीक्षक, बालोद ने आदेश जारी कर उनका मूल वेतन 35,400 रुपये से घटाकर 25,300 रुपये कर दिया। साथ ही ग्रेड पे 4,200 रुपये से घटाकर 2,400 रुपये निर्धारित कर दिया गया।
बिना नोटिस जारी हुआ था आदेश
याचिका में कहा गया कि वेतन कटौती का फैसला लेने से पहले न तो कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और न ही याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। इतना ही नहीं, वेतन कटौती जनवरी 2020 से लागू कर दी गई, जबकि आदेश की प्रति उन्हें फरवरी 2020 में मिली।इसके बाद जयश्री कौशिक ने एसपी के आदेश को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी कर्मचारी के वेतन का पुनर्निर्धारण या उसमें कटौती केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि इसका सीधा वित्तीय प्रभाव पड़ता है। इसलिए यह सिविल परिणाम (Civil Consequences) वाला आदेश माना जाएगा।
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में प्राकृतिक न्याय (Principles of Natural Justice) का पालन करना आवश्यक है। कर्मचारी को पहले नोटिस देना और उसका पक्ष सुनना कानूनी रूप से अनिवार्य है।इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने पुलिस अधीक्षक, बालोद द्वारा जारी वेतन कटौती के आदेश को निरस्त कर दिया।
फैसले का क्या असर होगा?
यह फैसला उन सरकारी कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनके वेतन या सेवा संबंधी लाभों में बिना सुनवाई के बदलाव किए जाते हैं। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी भी कर्मचारी के अधिकारों को प्रभावित करने वाला आदेश जारी करने से पहले न्यायसंगत प्रक्रिया अपनाना जरूरी है।



















