रायपुर। कौन कहता है बेटियां कोमल होती हैं… वो बेटे की जगह नहीं ले सकतीं?
जब वक्त कठिन हो, तो बेटियां सिर्फ घर की जिम्मेदारी नहीं संभालतीं, बल्कि बेटों से भी बढ़कर हर फर्ज निभाती हैं। रायपुर में दो बेटियों ने अपने पिता को अंतिम विदाई देकर यही साबित कर दिया।
पिता के सिर से उठा साया, इलाज में जमा-पूंजी खत्म हो गई, मां की आंखों में आंसू थे और घर में कोई बेटा नहीं था… लेकिन उन दोनों बेटियों ने हिम्मत नहीं हारी।
पहले उन्होंने पिता की अर्थी को कंधा दिया, फिर मुक्तिधाम पहुंचीं और सामाजिक परंपराओं की बेड़ियों को तोड़ते हुए अपने पिता को मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई दी।यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं।

पिता चले गए…और बेटियां मजबूत बन गईं
रायपुर के कचना स्थित हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी निवासी चिन्मय सरकार तेलीबांधा के एक नर्सिंग होम में सिक्युरिटी गार्ड के रूप में काम करते थे। उनके परिवार में पत्नी और दो बेटियां—रिशिता और रिक्ता थीं। उनका कोई बेटा नहीं था।
इसी सप्ताह ड्यूटी के दौरान अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। हाई ब्लड प्रेशर के कारण उन्हें ब्रेन हेमरेज हो गया। जांच में पता चला कि उनके सिर की नस फट गई है और खून जमने के कारण स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी है।
चिन्मय सरकार कोमा में चले गए। इसी बीच उन्हें हार्ट अटैक भी आ गया।
परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी।
एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल… फिर तीसरे अस्पताल तक इलाज के लिए भागते रहे। निजी अस्पतालों में लाखों रुपये खर्च हो गए। हालत में सुधार नहीं हुआ तो उन्हें आंबेडकर अस्पताल और फिर डीकेएस अस्पताल ले जाया गया।
लेकिन शुक्रवार की शाम जिंदगी की जंग लड़ते-लड़ते चिन्मय सरकार हार गए।
और यहीं से शुरू हुई उन दो बेटियों की जिंदगी की शायद सबसे कठिन परीक्षा।

बेटा नहीं था…तो बेटियों ने कहा, हम हैं न
पिता के जाने का गम एक तरफ था और मां का सहारा बनने की जिम्मेदारी दूसरी तरफ।
रिशिता और रिक्ता कभी खुद फूट-फूटकर रोतीं, तो कभी अपने आंसू पोंछकर मां को संभालतीं। पिता की अर्थी के सामने खड़ी दोनों बेटियों की आंखों में दर्द था, लेकिन दिल में एक ही बात थी—
“पापा ने हमें कभी बेटियों की तरह कमजोर नहीं समझा…आज उन्हें विदा करने का फर्ज हम निभाएंगी।”
जब अंतिम यात्रा की तैयारी हुई तो बेटियों ने किसी सामाजिक बंधन को अपने रास्ते में नहीं आने दिया।
उन्होंने पिता की अर्थी को कंधा दिया।
पिता की अर्थी उनके कंधों पर थी और शायद उन दोनों के बचपन की पूरी दुनिया उस अर्थी के साथ चल रही थी।
वह पिता, जिनकी उंगली पकड़कर उन्होंने चलना सीखा था…
आज उसी पिता को अंतिम यात्रा पर ले जाने के लिए दोनों बेटियां उनके अर्थी का सहारा बनी हुई थीं।
जिस हाथ को पकड़कर चलना सीखा था,
आज उसी पिता को विदा करने चलीं…
आंसू थे आंखों में, दर्द था दिल में,
मगर बेटियां थीं… इसलिए टूटकर भी खड़ी रहीं।
मुक्तिधाम में नम हो गईं सबकी आंखें
मुक्तिधाम पहुंचकर दोनों बेटियों ने वह फर्ज भी निभाया, जिसे समाज सदियों से सिर्फ बेटों से जोड़कर देखता आया है।
दोनों बेटियों ने अपने पिता को मुखाग्नि दी।
जैसे ही बेटियों ने पिता को अंतिम विदाई दी, वहां मौजूद कई लोगों की आंखें भर आईं।
कोई कह रहा था—“आज बेटियों ने बेटे से बढ़कर फर्ज निभाया है।”
किसी की जुबान से निकला—“चिन्मय सरकार बेटा नहीं होने का दुख लेकर नहीं गए होंगे… उन्हें अपनी बेटियों पर गर्व रहा होगा।”
जब अपनों ने किनारा किया, कॉलोनी के लोग बने परिवार
इलाज में परिवार की आर्थिक स्थिति पहले ही कमजोर हो चुकी थी। परिवार में पत्नी और दो बेटियों के अलावा कोई मजबूत सहारा नहीं था। ऐसे मुश्किल वक्त में हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के लोगों ने परिवार का हाथ थाम लिया।
कॉलोनी के पूर्व अध्यक्ष संजय अधिकारी, उपाध्यक्ष गोपी यादव और रामजी लाल समेत अन्य लोगों ने अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था संभाली। लोगों ने आर्थिक सहयोग भी किया और मुक्तिधाम में सभी जरूरी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी उठाई।
जब रिश्तों के कुछ लोग दूर हो गए, तब पड़ोसी और कॉलोनी के लोग ही परिवार बनकर उनके साथ खड़े रहे।
ये सिर्फ अंतिम संस्कार नहीं था…ये बेटियों की हिम्मत की कहानी थी
आज मुक्तिधाम में एक चिता जल रही थी… और उस आग के सामने दो बेटियों का बचपन भी जैसे हमेशा के लिए बड़ा हो गया।
पिता चले गए थे… लेकिन जाते-जाते दुनिया को एक सीख दे गए—
बेटियां पराया धन नहीं होतीं।
बेटियां पिता की कमजोरी नहीं,
उनकी सबसे बड़ी ताकत होती हैं।
और जब पिता नहीं रहते, तो कई बार वही बेटियां…
बेटों से भी ज्यादा मजबूती से घर, मां और जिम्मेदारियों का सहारा बन जाती हैं।
रिशिता और रिक्ता ने आज सिर्फ अपने पिता को मुखाग्नि नहीं दी।
उन्होंने उस सोच को भी जला दिया, जो कहती है कि अंतिम संस्कार का अधिकार सिर्फ बेटे को है।
उन्होंने साबित कर दिया कि फर्ज का कोई लिंग नहीं होता।
पिता की अंतिम यात्रा में जब बेटियां कंधा दे रही थीं, तो शायद आसमान से उनका पिता भी उन्हें देख रहा होगा…
और मन ही मन कह रहा होगा—
“मुझे बेटे की जरूरत कभी थी ही नहीं…
मेरी दो बेटियां ही मेरे लिए दो बेटों से बढ़कर थीं।”
बेटियों के नाम दो शब्द
जिस दिन पिता की अर्थी को कंधों पर उठाया,
उस दिन बेटियों ने दुनिया को बता दिया…
बेटी सिर्फ आंगन की चिड़िया नहीं होती,
वक्त पड़े तो पूरे घर का आसमान बन जाती है।
पिता चले गए, मगर बेटियां रोते-रोते संभल गईं,
मां की टूटी हुई दुनिया को अपने हाथों से थाम गईं।
किसने कहा बेटियां सिर्फ विदा होने के लिए होती हैं,
आज दो बेटियां पिता को कंधा देकर अमर हो गईं।



















