रायपुर। छत्तीसगढ़ में कार्यरत शिक्षकों की पदोन्नति में शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। सहायक शिक्षक समग्र शिक्षक फेडरेशन ने शिक्षा विभाग से इस मामले में स्पष्ट नीति और नियम जारी करने की मांग की है। फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र राठौर ने सवाल उठाया है कि यदि कार्यरत शिक्षकों की पदोन्नति के लिए TET अनिवार्य योग्यता थी, तो वर्ष 2018 और उसके बाद शिक्षकों के शासकीय सेवा में संविलियन के दौरान उनके दस्तावेजों और योग्यता की जांच के समय इस शर्त को स्पष्ट क्यों नहीं किया गया।
फेडरेशन का कहना है कि संविलियन के समय शिक्षकों के शैक्षणिक दस्तावेजों और अन्य आवश्यक योग्यताओं की जांच की गई थी। इसके बाद ही उन्हें शासकीय सेवा में शामिल किया गया। ऐसे में वर्षों तक सरकारी सेवा में कार्य करने के बाद अब पदोन्नति के समय TET को लेकर नई स्थिति सामने आने से हजारों शिक्षकों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।
अधिकारियों की लापरवाही का खामियाजा शिक्षक क्यों भुगतें?
रविंद्र राठौर ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से आरटीई अधिनियम में वर्ष 2017 में संशोधन किए जाने के बाद कार्यरत शिक्षकों के संबंध में विभाग को समय रहते स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करना चाहिए था। यदि उस समय विभाग की ओर से सेवारत शिक्षकों को TET उत्तीर्ण करने के संबंध में स्पष्ट सूचना या आदेश जारी नहीं किया गया, तो अब उसकी जिम्मेदारी शिक्षकों पर डालना उचित नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग को पूरे मामले की तथ्यात्मक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। विभाग यह स्पष्ट करे कि वर्ष 2017 के बाद कार्यरत शिक्षकों के लिए TET को लेकर क्या निर्देश जारी किए गए थे और संबंधित शिक्षकों को इसकी जानकारी किस माध्यम से दी गई थी।
फेडरेशन ने यह भी मांग की है कि यदि इस मामले में प्रशासनिक स्तर पर किसी प्रकार की चूक हुई है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
संविलियन के समय योग्य, पदोन्नति में अयोग्य कैसे?
फेडरेशन ने पदोन्नति में TET की अनिवार्यता को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही उठाया है कि जिन शिक्षकों के दस्तावेजों की जांच के बाद उन्हें शासकीय सेवा में संविलियन दिया गया, उन्हीं शिक्षकों की पदोन्नति के समय अलग मापदंड कैसे लागू किया जा सकता है।
रविंद्र राठौर ने कहा कि प्रदेश के हजारों शिक्षक लंबे समय से सरकारी स्कूलों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक हैं, जिन्होंने ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में वर्षों तक शिक्षण कार्य किया है। ऐसे शिक्षकों की वरिष्ठता, अनुभव और सेवा अवधि को ध्यान में रखते हुए पदोन्नति के मामले में शासन को संवेदनशील और स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए।
नियम और न्यायालय के आदेश का सम्मान, लेकिन समाधान जरूरी
फेडरेशन अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि संगठन किसी नियम या न्यायालय के आदेश की अवहेलना नहीं करना चाहता। हालांकि, शिक्षकों के भविष्य और पदोन्नति से जुड़े इस महत्वपूर्ण विषय पर शासन और शिक्षा विभाग को कानूनी प्रावधानों के भीतर रहते हुए उचित समाधान तलाशना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शिक्षकों को लंबे समय से सेवा देने के बाद पदोन्नति के अवसर से वंचित होने की स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए। शासन को इस मामले में सभी पक्षों का अध्ययन कर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए, ताकि शिक्षकों के बीच बनी असमंजस की स्थिति समाप्त हो सके।
समाधान नहीं हुआ तो प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी
रविंद्र राठौर ने कहा कि फेडरेशन लगातार शिक्षकों के हितों से जुड़े मुद्दों को शासन और विभाग के समक्ष रखता रहा है। यदि TET की अनिवार्यता को लेकर शिक्षकों की समस्या का संतोषजनक समाधान नहीं किया गया, तो संगठन लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से प्रदेश स्तर पर आंदोलन करने के लिए बाध्य होगा।
उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर इसकी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी। फेडरेशन ने सरकार से मांग की है कि पदोन्नति में TET की अनिवार्यता से जुड़े पूरे मामले की समीक्षा कर जल्द स्पष्ट नीति जारी की जाए।


















